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MANGAL PANDEY
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मंगल पांडे
इतिहास के आइने में
1857 की क्रांती के प्रणेता प्रथम शहिद मंगल पाण्डेय
कहा जाता है कि पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था परन्तु 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे के विद्रोह से उठी ज्वाला वक्त का इन्तजार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज हो गया. मंगल पाण्डे को 1857 की क्रान्ति का पहला शहीद सिपाही माना जाता है.
मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को तत्कालीन गाजीपुर जनपद के बलिया तहसील अंतर्गत नगवां गांव के टोला बंधुचक में सुदिष्ट पाण्डेय व जानकी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। वे तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के 19 वीं नेटिव इंफेंटरी रेजीमेंट के सिपाही थे। 1857 में भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में विद्रोह शुरू करने का श्रेय बलिया के नगवा गांव निवासी मंगल पाण्डेय को ही है। कारतूस में गाय व सूअर की चर्बी को लेकर 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डेय का क्रोध भड़क उठा।
29 मार्च 1857, दिन रविवार जनरल जान हियर्से अपने बंगले में आराम कर रहा था कि एक लेफ़्टिनेन्ट बदहवास सा दौडता हुआ आया और बोला कि देसी लाईन में दंगा हो गया है. खून से रंगे अपने घायल लेफ़्टिनेन्ट की हालत देखकर जनरल जान हियर्से अपने दोनों बेटों को लेकर 34वीं देसी पैदल सेना की रेजीमेन्ट के परेड ग्राऊंड की और दौडा. उधर धोती-जैकट पहने 34वीं देसी पैदल सैना का जवान मंगल पाण्डे नंगे पांव ही एक भरी बन्दूक लेकर कवाटर गार्ड के सामने बडे ताव में चहल कदमी कर रहा था और रह-रह कर अपने साथियों को ललकार रहा था - "अरे ! अब कब बंदूक निकलोगे ? तुम लोग अभी तक तैयार क्यों नहीं हो रहे हो ? ये अंग्रेज हमारा धर्म भ्रष्ट कर देंगे. तुम सब मेरे पीछे आओ. हम इन्हें अभी खत्म कर देते हैं." लेकिन अफ़सोस किसी ने उसका साथ नहीं दिया. परन्तु मंगल पाण्डे ने हार नहीं मानी और अकेले ही अंग्रेजी हुकूमत को ललकारता रहा. तभी अंग्रेज सार्जेंट मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन ने मंगल पाण्डे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया. यह सुन मंगल माण्डे का खून खौल उठा और उसकी बन्दूक गरज उठी. सार्जेट मेजर ह्यूसन वहीं लुढक गया. अपने साथी की यह स्थिति देख घोडे पर सवार लेफ़टिनेन्ट एडजुटेंट बेम्पडे हेनरी वाग मंगल पाण्डे की तरफ़ बढा , परन्तु इससे पहले कि वह उसे काबू कर पाता मंगल पाण्डे ने उस पर गोली चला दी. दुर्भाग्य से गोली घोडे को लगी और वाग नीचे गिरते हुये फ़ुर्ती से उठ खडा हुआ. अब दोनो आमने-सामने थे. इस बीच मंगल पाण्डे ने अपनी तलवार निकाल ली और पलक झपकते ही वाग के सीन और कंधे को चीरते हुये निकल गई. तब तक जनरल जान हियर्से ने जमादार ईश्वरी प्रसाद को हुक्म दिया कि मंगल पाण्डे को तुरन्त गिरफ़्तार कर लो पर उसने ऐसा करने से मना कर दिया. तब जनरल हियर्से ने भोख पल्टू को मंगल पाण्डे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया. भोख पल्टू ने मंगल पाण्डे को पीछे से पकड लिया. स्थिति भयावह हो चली थी. मंगल पाण्डे ने गिरफ़्तार होने से बेहतर मौत को गले लगाना उचित समझा और बंदूक की नाली अपने सीने पर रख पैर के अंगूठे से फ़ायर कर दिया. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, सो मंगल पाण्डे सिर्फ़ घायल होकर ही रह गया. तुरन्त अंग्रेजी सेना ने उसे चारों तरफ़ से घेर कर बन्दी बना लिया और मंगल पाण्डे के कोर्टमार्शल का आदेश हुआ. अंग्रेजी हुकूमत ने 6 अप्रेल को फ़ैसला सुनाया कि मंगल पाण्डे को 18 अप्रेल को फ़ांसी पर चढा दिया जाये. परन्तु बाद में यह तारीख 8 अप्रेल कर दी गई ताकि विद्रोह की आग अन्य रेजिमेन्टों में भी न फ़ैल जाये. मंगल पाण्डे के प्रति लोगों में इतना सम्मान पैदा हो गया था कि बैरकपुर का कोई जल्लाद फ़ांसी देने को तैयार नहीं हुआ. नजीतन कलकता से चार जल्लाद बुलाकर मंगल पाण्डे को 8 अप्रेल, 1857 के दिन फ़ांसी पर चढा दिया गया. मंगल पाण्डे को फ़ांसी पर चढाकर अंग्रेजी हुकूमत ने जिस विद्रोह की चिंगारी को खत्म करना चाहा, वह तो फ़ैल ही चुकी थी और देखते ही देखते इसने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया.
14 मई 1857 को गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंगज ने मंगल पाण्डे का फ़ांसी नामा अपने आधिपत्य में ले लिया. 8 अप्रेल, 1857 को बैरकपुर, बंगाल में मंगल पाण्डे को प्राण दण्ड दिये जाने के ठीक सवा महीने बाद, जहां से उसे कल्कत्ता के फ़ोर्ट विलियम कालेज में स्थानान्तरित कर दिया गया था. सन 1905 के बाद जब लार्ड कर्जन ने उडीसा, बंगाल, बिहार और मध्य प्रदेश की थल सेनाओं का मुख्यालय बनाया गया तो मंगल पाण्डे का फ़ांसीनामा जबलपुर स्थान्तरित कर दिया गया. जबलपुर के सेना आय्ध कोर के संग्राहलय में मंगल पाण्डे का फ़ांसीनाम आज भी सुरक्षित रखा है. इसका हिन्दी अनुवाद निम्नवत है :-
जनरल आर्डर्स वाय हिज एक्सीलेन्सी द कमान्डर इन चीफ़, हेड कवार्टर्स, शिमला - 18 अप्रेल 1857,
गत 18 मार्च 1857, बुधवार को फ़ोर्ट बिलियम्स में सम्पन्न कोर्ट मार्शल के वाद कोर्ट मार्शल समिति 6 अप्रेल 1857, सोमवार के दिन बैरकपुर में पुन: इकट्ठा हुई तथा पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेन्ट्री के 1446 नंबर के सिपाही मंगल पाण्डे के खिलाफ़ लगाये गये निम्न आरोपों पर विचार किया.
आरोप (1) बगावत : - 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में परेड मैदान पर अपनी रेजीमेंट की कवार्टर्गाड के समक्ष तलवार और राईफ़ल से लैस होकर अपने साथियों को ऐसे शब्दों में ललकारा, जिससे वे उत्तेजित होकर उसका साथ दें तथा कानूनों का उल्लंघन करें.
आरोप (2) इसी अवसर पर पहला वार किया गया तथा हिंसा का सहारा लेते हुये अपने वरिष्ठ अधिकारियों, सार्जेंट-मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन और लेफ़्टिनेंट-अडजुटेंट बेंम्पडे हेनरी वाग जो 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेन्ट्री के ही थे, पर अपनी राईफ़ल से कई गोलियां दागी तथा बाद में तलवार से कई वार किये.
निष्कर्ष :- अदालत पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को उक्त आरोपों का दोषी पाती है.
सजा: -अदालत पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को मृत्यु पर्यन्त फ़ांसी पर लटकाये रखने की सजा सुनाती है.
अनुमोदित एंव पुष्टिकृत
हस्ताक्षरित जे.बी. हर्से, मेजर जनरल कमाण्डिंग
प्रेजीडेन्सी डिवीजन बैरकपुर - 7 अप्रेल 1857.
टिप्पणी : पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को कल 8 अप्रेल को प्रात: साढे पांच बजे ब्रिगेड परेड पर समूची फ़ौजी टुकडी के समक्ष फ़ांसी पर लटकाया जायेगा.
हस्ताक्षरित जे.बी. हर्से, मेजर जनरल कमाण्डिंग
प्रेजीडेन्सी डिवीजन
इस आदेश को प्रत्येक फ़ौजी टुकडी की परेड के दौरान और खास तौर से बंगाल आर्मी के हर हिन्दुस्तानी सिपाही को पढकर सुनाया जाये.
वाय आर्डर आफ़ हिज एक्सीलेन्सी
द कमान्डर इन चीफ़
सी. वेस्टर, कर्नल.
यहीं से भड़की आजादी की आग ने अंत में देश को आजाद करके ही दम लिया।
स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद मंगल पांडेय के 158 वें शहादत दिवस
29 मार्च 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी में दो अग्रेज अधिकारियों को मारकर शहीद मंगल पांडेय ने जंगे आजादी की अलख जगाई थी। तब से लेकर अब तक इस दिन को क्रांति दिवस के रुप में मनाया जाता है।
‘जिन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए ब्रितानी हुकूमत का डटकर मुकाबला किया। जिन्होंने अपने परिवार की चिंता किए बगैर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम सहे। जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपनी पहली शहादत दी।
आम तौर पर ये तो सभी जानते हैं कि आजादी की जंग में सेना में रहकर विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बलिया जिले के नगवां गांव निवासी सुदिष्ट पाण्डेय के पुत्र अमर शहीद मंगल पाण्डेय अविवाहित थे। लेकिन उनके दो सगे भाई थे। बड़े भाई नरेंद्र पाण्डेय व छोटे भाई ललित पाण्डेय। ललित पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महावीर पाण्डेय व महादेव पाण्डेय हुए। महावीर पाण्डेय के एकमात्र पुत्र थे बरमेश्वर पाण्डेय। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में मंगल पाण्डेय से प्रेरित बरमेश्वर भी आजीवन अविवाहित रहते हुए अपना जीवन देश के नाम उत्सर्ग कर दिया।बरमेश्वर पाण्डेय ने भी आजादी की जंग में सक्रिय योगदान निभाया था। तब के बलिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इन्हें अपना कप्तान चुन लिया था और वे आजीवन कप्तान साहब कहे जाते रहे। वे 1930 से 1942 तक सक्रिय रूप से अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। दर्जनों बार जेल गए और यातनाएं सही।अमर शहीद मंगल पाण्डेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही थे, न कि अंग्रेजी सेना के। जब मंगल पाण्डेय ने बगावत की थी, तब विक्टोरिया ने उसे अपने कब्जे में नहीं लिया था। मंगल पाण्डेय ने न सिर्फ देश की आजादी बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
बी एस बघेल
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