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PARASHU RAM

Posted by bsbaghel on March 14, 2015 at 12:35 PM

पं. परशुराम जी की कहानी

परशुराम जी ने मात्र 3 क्षत्रियों से लडाई मोल लिया था चार बार युद्ध किया था एक बार जीता था तीन बार हारा था

1. सम्राट सहस्त्रार्जुन हैहय वंश से पहला विरोध लिया था।

2. श्री राम

3. भीष्म पितामह

क्षात्र धर्म एवं ब्राम्हण धर्म दो मुख्य धर्म है पुरातन इतिहास मे प्रथम अंतरवर्ण विवाह क्षत्राणी रेणुका एवं ऋषि जमदग्नि ने किया थ। माता रेणुका ने जमदग्नि ऋषि के व्यक्तित्व में क्षत्रिय स्वरुप क्षात्र धर्म खोजना चाहा। एक क्षत्राणी अपने मन में उठने वाली हर भावना को अपने पति के सामने प्रकट कर देती है और करीब करीब सभी क्षत्रिय पति भी उनकी इन भावनाओ को अन्यथा नहीं लेते है और उन भावनाओ का उचित समाधान करते है .

जमदग्नि ऋषि रेणुका को अपने स्नान के लिए जल लाने के लिए कहा।रेणुका जी सरोवर में जल लेने गयी , वहां सरोवर में अश्वनी कुमार को अफ्सराओं के साथ स्नान करते हुए देखा।सरल स्वभाव रेणुका जी उन्हें देखती रही और मन में सोचने लगी कि यदि मैंने किसी क्षत्रिय विवाह किया होता तो मै भी इसी तरह राजसी सुख में होती । इसी सोच विचार मे उन्हें सरोवर से जल लाने मे काफी विलंब हुआ। जल लाने मे विलंब के कारण रेणूका से नाराज जमदग्नि अशांत बैठे थे ऱेणूका के आने पर जमदग्नि ने विलंब का कारण जानना चाहा तब रेणुका जी ने सब कुछ यों का त्यों जो उनके मन विचार आ रहा था बता दिया। इस घटना ने ऋषि जमदग्नि के मन मे रेणुका के प्रेम को शंका मे परिवर्तित कर दिया।

इस पर पंडितो ने कुछ ग्रंथो में लिखा है कि जमदग्नि ने उसी दिन से रेणुका का त्याग कर दिया था किन्तु इस विषय मे अनेक शोध के अनुसार जमदग्नि उस दिन से रेणुका पर बहुत शक करने लगे थे।

इस घटना के कुछ समय बाद सम्राट सहस्त्रार्जुन कहीं युद्ध मे जा रहे थे। इन्होने तत्कालीन ब्राह्मण रावण को अपनी अश्व शाला में बांध कर रख दिया था। रावण में 20 भुजाओं का बल था किन्तु सहस्त्रार्जुन में 1000 भुजाओं का बल था । सम्राट सहस्त्रार्जुन युद्ध मे विजय यात्रा से लौट रहे थे कि रास्ते में जमदग्नि के आश्रम में कुछ देर रुके , तब ऋषि जमदग्नि ने जल पान करने का अनुरोध किया इस पर सम्राट ने कहा मेरे साथ पूरी सेना है अतः मै अकेला जल पान कैसे करूँ

इसपर ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु गाय की मदद से पूरी सेना को भोजन एवं पकवान खिलाये । सम्राट सहस्त्रार्जुन ने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु का रहस्य मालूम होने पर उन्होंने कामधेनु को ऋषि जमदग्नि से उपहार स्वरूप माँगा किन्तु ऋषि ने नहीं दिया।

इस पर सम्राट सहस्त्रार्जुन ने जबरदस्ती कामधेनु को ले लिया ऋषि जमदग्नि ने श्राप का भय दिखाया परन्तु सम्राट सहस्त्रार्जुन ऋषि जमदग्नि से ज्यादा बड़े तपस्वी थे इसलिए ऋषि जमदग्नि का श्राप काम नहीं आया।

जब कामधेनु चली गयी तो ऋषि जमदग्नि ने आमरण अनशन प्रारंभ किया , इस घटना से रेणुका जी को बहुत क्रोध आया और वे सीधे सम्राट सहस्त्रार्जुन की राजधानी पहुंच गयी । वहां जाकर सम्राट सहस्त्रार्जुन को फटकार लगायी कि तुम कैसे क्षत्रिय हो जो एक ऋषि की म्रत्यु का कारण बन रहे हो सम्राट सहस्त्रार्जुन, रेणुका जी की वाणी से प्रभावित हुए और कामधेनु उन्हें सौंप कर अपनीकृत्य के लिए पश्चाताप कर क्षमा मांगी।

रेणुका कामधेनु को लेकर आश्रम पहुंची तब ऋषि जमदग्नि खुश नही हुए तथा लगे कि जो सम्राट मेरे श्राप से नहीं डरा वह रेणुका को कामधेनु कैसे वापस कर दिया। ऋषि जमदग्नि ने सोचा कि रेणुका ने सम्राट के साथ अपने सतीत्व को नष्ट किया होगा , उस दिन के बाद ऋषि जमदग्नि ने रेणुका को दण्डित करना चाहा किन्तु सफल नहीं हो पाया। ऋषि जमदग्नि बदले की ज्वाला से जलते हुए सहस्त्रार्जुन को दंड देने के लिए परशुराम को भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्राप्त किया।

ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र क्रमश: रुक्मवान, सुषेणु, वसु , विश्वावसु और परशुराम थे । महर्षि जमदग्नि ने उन सभी से बारी-बारी अपनी मां का वध करने को कहा लेकिन चार पुत्रो ने ऐसा नहीं किया। तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गई।

तब ऋषि जमदग्नि परशुराम को अपनी माता का वध करने का आदेश दिया कि वह अपनी माता रेणुका का सिर काट कर लाये । परशुराम सनातन काल मे विश्व का का पहला माँ का हत्यारा बन कर माँ रेणुका का शीश काट दिया। जब रेणुका की मौत और उनके साथ हुए अन्याय की खबर सम्राट सहस्त्रार्जुन को लगी कि रेणुका को इस लिए मार दिया गया क्योंकि उस पर आरोप है कि उसने राजा के साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाये थे इस पर क्रोधित राजा सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि और परशुराम पर आक्रमण कर दिया।परशुराम डर कर वन में जान बचाकर भाग गये किन्तु राजा ने दंड स्वरुप ऋषि जमदग्नि का सिर धड से अलग कर दिया।

इसके बाद परशुराम ने भारी तपस्या की और भगवान शंकर से फरशा शस्त्र प्राप्त किया और फिर सम्राट सहस्त्रार्जुन के ऊपर आक्रमण किया। इस बार भारी युद्ध के बाद परशुराम की विजय हुयी और फिर परशुराम अपनी हरकतों पर उतरे।परशू राम ने हैहय वंश के बच्चे बूढ़े गर्भवती महिलाओ तक की हत्या कर दी .सम्राट सहस्त्रार्जुन के पास 21 राज्य थे उन्हें हस्तगत कर लिया चाटुकार पंदितो ने उन 21 राज्यों को पहले 21 वंश और फिर बढ़ा कर 21 बार क्षत्रिय विहीन लिखना शुरू का दिया।

इस घटना के पश्चात परशुराम बहुत घमंडी हो गया किन्तु फिर भी विश्वामित्र और महाराज दशरथ और जनक जैसे क्षत्रियों के सामने आने से कतराते थे।

जब श्री राम ने शिव जी के धनुष को भंग कर दिया और परशुराम को पता चलने पर राजा जनक और विश्वामित्र जी जैसे क्षत्रियों के समक्ष आने का साहस नहीं कर पाया।जब श्री राम अयोध्या और मिथिला के मध्य मार्ग में थे और विश्वामित्र जी अपने आश्रम चले गए तब परशुराम श्री राम को डराने पहुंच गये ताकि भविष्य मे कोई क्षत्रिय उअनके सामने न आये ।

इस सोच के साथ परशुराम सीधा बिना अनुमति लिए अयोध्या के युवराज के रथ के पास पहुँच गया ।परशुराम ने देखा कि श्री राम ने उसनी ओर देखा तक नहीं इससे परशुराम चिढ गया और बोले "हे राम शिव के पुराने धनुष को तोड़ने से तुम्हे इतना घमंड कि मुझे पहचाना तक नहीं ? "श्री राम ने सहज भाव से कहा हां मैने तो आपको नहीं पहचाना किन्तु क्या आप मेरा वेश अर्थात अयोध्या का युवराज और ध्वजा दिखाई नहीं दे रही है ? परशुराम बोल मुझे प्रणाम तक नहीं किया । श्री राम बोले आपको तो अयोध्या के युवराज का आदर करना चाहिए । विवाद बढ़ता देख महाराज दशरथ जी आये और सोचा यह मुर्ख परशुराम केवल प्रणाम के लिए अनावश्यक उलझ रहा है ।

महाराज दशरथ जी बोले " हां ऋषिवर आपको मै पहचानता हूँ । किन्तु परशुराम ने महाराज दशरथ जी को जोर का धक्का मार दिया।

परिणाम्स्वरुप वही हुआ जो किसी क्षत्रिय के सामने उसके पिता के अपमान करने वाले का होता है।

श्री राम ने धनुष संभाला , परशुराम एक पिनाक धनुष को लिए फिरता था और परशुराम को वरदान था कि जो इस पिनाक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दे वह तेरा काल है उससे कैसे भी बचकर भाग जाना।परशुराम ने कहा इतना बडा योद्धा है राम तो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर बता।

श्री राम ने प्रत्यंचा ही नहीं बाण भी चढ़ा लिया और कहा " हे मुर्ख और घमंडी तपस्वी तूने मेरे पिता का अपमान किया है अब मै तेरी सारी तपस्या,21 राज्यों जिन्हें तूने सहस्त्रार्जुन से लिया था और तेरी मनोगति से विचरण क़ी क्षमता को इस एक ही बाण से समाप्त किये देता हूँ।

इस पर परशुराम महाराज दशरथ के पैरो में गिर गए और कहा कि अपने यशस्वी पुत्र से मुझे कम से कम केवल मनोगति से विचरण की क्षमता को छोड सब कुछ खत्म करने का अनुरोध किया ।

महाराज दशरथ जी के कहने पर श्री राम ने परशुराम की केवल एक बार मनोगति से विचरण की क्षमता छोड़ी बाकि 21 राज्य और सारी तपस्या का बल हर लिया।

तथा चेतवानी दी कि मेरे पूरे जीवन काल में दुबारा मत दिखाई देना वरना फिर माफ़ नहीं करूँगा।वहां से जान बचाकर परशुराम भागे और महेन्द्र पर्वत पर जाकर वहां जातिवादी स्कुल खोली जिसमे किसी गैर ब्राह्मण को शिक्षा नहीं दी जाती थी।परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता रेणुका जो क्षत्राणी थी की शिक्षाओं से सीख ली थीँ वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है। अपवाद स्वरुप केवल दो ब्यक्ति भीष्म एवं कर्ण को शिक्षा दिया था , परन्तु जैसे ही कर्ण क्षत्रिय है पता लगा श्राप देकर उस विद्या से कर्ण को विलग कर दिया था

भीष्म से पराजित होते सभी ने देखा होगा। इस महान परशुराम जी की यही कहानी है चार बार 3 क्षत्रियों से दुश्मनी मोल लिया 3 बार हारे एक बार जीते थे।

महर्षि बाल्मीकि जी की रामायण से पूरी वस्तविकता सामने है । तुलसी दास जी ने और उससे पहले कुछ पुराणों में परशुराम को जबरदस्ती लेखनी के बल पर महान बनाने का दुष्कृत्य किया जा रहा है।परशुराम शिव धनुष का रक्षक नहीं थे। होते तो शिव जी का वह धनुष मिथिला में नहीं होता।परशुराम को अपने तपोबल की श्रेष्टता सिद्ध करनी थी पर हुआ उसका उल्टा .

कुछ लोग कहते श्री कृष्ण ने भी परीक्षत को जीवन दान दिया उस सम्बन्ध में यह था कि श्री कृष्ण ने परीक्षित का उपचार किया था अश्वसथामा ने भी वही कायराना हरकत करके परीक्षित जी को मृत प्राय कर दिया था जिनका इलाज वासुदेव श्री कृष्ण ने स्पर्श विज्ञान द्वारा किया था।

 

बी एस बघेल

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