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MAJOR DHYAN CHAND SINGH
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भारत रत्न के सर्वोच्च एवं सबसे उपयुक्त
हाकी के जादूगर
मेजर ध्यानचंद सिंह
मेजर ध्यानचंद सिंह का जन्म 29 अगस्त सन् 1905 ई. को इलाहाबाद संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत में हुआ था एवं मृत्यु 3 दिसंबर, 1979 को हुआ। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी। साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में 1922 में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से सेना मे भरती हुए थे। जब 'प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट' में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी को है। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए।सन् 1922 . से सन् 1926 तक सेना की ही प्रतियोगिताओं में हाकी खेला करते थे। दिल्ली में हुई वार्षिक प्रतियोगिता में जब इन्हें सराहा गया तो इनका हौसला बढ़ा। 13 मई सन् 1926 . को न्यूजीलैंड में पहला मैच खेला था। न्यूजीलैंड में 21 मैच खेले जिनमें 3 टेस्ट मैच भी थे। इन 21 मैचों में से 18 जीते, 2 मैच अनिर्णीत रहे और और एक में हारे। पूरे मैचों में इन्होंने 192 गोल बनाए। उनपर कुल 24 गोल ही हुए। 27 मई सन् 1932 को श्रीलंका में दो मैच खेले। ए मैच में 21-0 तथा दूसरे में 10-0 से विजयी रहे। सन् 1935 ई. में भारतीय हाकी दल के न्यूजीलैंड के दौरे पर इनके दल ने 49 मैच खेले। जिसमें 48 मैच जीते और एक वर्षा होने के कारण स्थगित हो गया। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए। अप्रैल, 1949 को प्रथम कोटि की हाकी से संन्यास ले लिया।
सन् 1927 में लांस नायक बना दिए गए। सन् 1932 में लॉस ऐंजल्स जाने पर नायक नियुक्त हुए। सन् 1937 में जब भारतीय हाकी दल के कप्तान थे तो उन्हें सूबेदार बना दिया गया। जब द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हुआ तो सन् 1943 में 'लेफ्टिनेंट' नियुक्त हुए और भारत के स्वतंत्र होने पर सन् 1948 में कप्तान बना दिए गए। केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई। 1938 में उन्हें 'वायसराय का कमीशन' मिला और वे सूबेदार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।
उन्हें १९५६ में खेल के क्षेत्र मेंभारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।
उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।
उन्हें भारत एवं विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाडियों में शुमार किया जाता है। वे तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं जिनमें 1928 का एम्सटर्डम ओलोम्पिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलोम्पिक एवं 1936 का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है। उनकी जन्म तिथि 29 अगस्त को भारत में "राष्ट्रीय खेल दिवस" मनाया जाता है |
मेजर ध्यानचंद सिंह ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना प्रशंसक बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंतर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त 2005 को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाया एवं 29 अगस्त2005 मेजर ध्यानचंद सिंह के जन्मशती को खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से सन 1935 मे जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी तब मिले थे । तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और मेजर ध्यानचंद सिंह दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।
ब्रैडमैन को जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का जबर्दस्त प्रशंसक बना दिया। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के सभी हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर एक ही नाम छाया रहता था और वह था ध्यानचंद। मेजर ध्यानचंद सिंह के स्टीक मे गेंद इस कदर से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। हॉकी मे उनकी कलाकारी देखकर हॉकी के प्रशंसक वाह-वाह कहते ही थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मदमस्त हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश की थी।
लेकिन मेजर ध्यानचंद सिंह ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।
1.वियना में मेजर ध्यानचंद सिंह की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई गी है और दिखाया गया है कि मेजर ध्यानचंद सिंह कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे।
2.भारत की स्वतंत्रता के पहले जब भारतीय हॉकी टीम विदेशी दौरे पर थी, भारत ने 3 ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. और खेले गए 48 मेचो में से सभी 48 मेच भारत ने जीते.
3. भारत 20 वर्षो से हॉकी में अपराजेय था. हमने अमेरिका को खेले गए सभी मेचो में करारी मात दी इसी के चलते अमेरिका ने कुछ वर्षो तक भारत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था .
4. मेजर ध्यानचंद सिंह की प्रशंसको की सूची में हिटलर का नाम सबसे उपर आता है.
5.हिटलर ने मेजर ध्यानचंद सिंह को जर्मनी की नागरिकता लेने के लिए प्रार्थना की, साथ ही जर्मनी की ओर से खेलने के लिए आमंत्रित किया' उसके बदले उन्हें सेना का अध्यक्ष और बहुत सारा पैसा देने की बात कही. लेकिन जवाब में ध्यानचंद ने उन्हें कहा की मैं पैसो के लिए नहीं देश के लिए खेलता हूँ.
6. हिटलर मेजर ध्यानचंद सिंह के प्रशंसक कैसे बने ?
जब जर्मनी में हॉकी वर्ल्डकप चल रहा था.तब एक मैच के दौरान जर्मनी के गोल कीपर ने उन्हें घायल कर दिया. इसी बात का बदला लेने के लिए मेजर ध्यानचंद सिंह ने टीम के सभी खिलाडियों के साथ एक योजना बनायीं और
भारतीय टीम ने गोल तक पहुचने के बाद भी गोल नहीं किया और बॉल को वही छोड़ दिया. यह जर्मनी के लिए बहुत'बड़ी शर्म की बात थी.
7. एक मैच ऐसा था जिसमे मेजर ध्यानचंद सिंह एक भी गोल नहीं कर पा रहे थे .
इस बीच उन्होंने रेफरी से कहा "मुझे मैदान की लम्बाई कम लग रही है" जांच करने पर मेजर ध्यानचंद सिंह सही पाए गए और मैदान को ठीक किया गया. उसके बाद ध्यानचंद ने उसी मैच में 8 गोल दागे.
8. वे मेजर ध्यानचंद सिंह एक अकेले भारतीय थे जिन्होंने आजादी से पहले भारत में ही नहीं जर्मनी में भी भारतीय झंडे को फहराया.उस समय हम अंग्रेजो के गुलाम हुआ करते थे भारतीय ध्वज पर प्रतिबंद था. इसलिए उन्होंने ध्वज को अपनी नाईट ड्रेस में छुपाया और उसे जर्मनी ले गए. इस पर अंग्रेजी शासन के अनुसार उन्हें कारावास हो सकती थी लेकिन हिटलर ने ऐसा नहीं किया.
9. जीवन के अंतिम समय में उनके पास खाने के लिए पैसे नहीं थे.
इसी दौरान जर्मनी और अमेरिका ने उन्हें कोच का पद ऑफर किया लेकिन उन्होंने यह कहकर नकार दिया की "अगर मै उन्हें हॉकी खेलना सिखाता हूँ तो भारत और अधिक समय तक विश्व चैंपियन नहीं रहेगा."
लेकिन भारत की सरकार ने उन्हें किसी प्रकार की मदद नहीं की तदुपरांत भारतीय आर्मी ने उनकी मदद की.
एक बार ध्यानचंद अहमदाबाद में एक हॉकी मैच देखने गए. लेकिन उन्हें स्टेडियम में प्रवेश नहीं दिया गया स्टेडियम संचालको ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया . इसी मैच में जवाहरलाल नेहरु ने भी भाग लिया था.
10. आख़िरकार क्रिकेट के आदर्श सर डॉन ब्रेड मैन ने कहा "मै ध्यानचंद का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ मेरे रन बनाने से भी आसानी से वे गोल करते है,"
ऎसे भारत माता के सपूत जिन्होने केवल भारत के लिए हाकी खेला एवं भारत को अपना सब कुछ सौंप दिया क्या भारत रत्न का हकदार नही है ?
यह चोंकाने वाली बात है भारत की सरकार द्वारा उन्हें भारत रत्न नहीं मिला लेकिन लगभग 50 से भी अधिक देशो से उन्हें 400 से अधिक अवार्ड प्राप्त हुए.
नतमस्तक है हम ऐसे महान हस्ती मेजर ध्यानचंद सिंह के सामने जिन्होने भारत मे जन्म लिया था !!
!!! जय भारत , जय हिन्द !!!
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