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18 जून 1576 हल्दी घाटी का एतिहासिक लड़ाई

Posted by bsbaghel on June 18, 2010 at 5:52 AM

18 जून 1576 हल्दी घाटी का एतिहासिक लड़ाई

            सम्पूर्ण भारत में सत्ता की मंसूबा पाले अकबर को मेवाड़ में सत्ता प्राप्ति के बिना अधूरा था . अकबर मेवाड़ पर सता हेतु अपनी कुटनीतिक असफलता , निराशा एवं नाराजगी के चलते मेंवाड में  सैनिक अभियान 17 फरवरी 1576 को फ़तेहपुर सीकरी से अजमेर की तीर्थ यात्रा के नाम पर प्रारम्भ किया था .

            जेठ की तपती दोपहरी 18 जून 1576 हल्दी घाटी का कण कण जगमगा रहा था एक ओर मांडलगढ़  अकबर की सेना का सेनापति आमेर के राजकुमार मान सिंह के नेतृत्व  में आधुनिक अस्त्र शास्त्र से सुसज्जित 10 हजार मुग़ल सैनिक  दूसरी ओर प्रताप सिंह के नेतृत्व में अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित मात्र  तीन हजार मेवाडियो की अश्वारोही सेना .

            मुग़ल सैनिकों ने  हल्दी घाटी के दर्रे में जैसे ही प्रवेश किया राजपूतो ने मुग़ल सैनिको पर हमला बोल दिया सैकड़ो मुग़ल सैनिक मारे गए . राणा प्रताप सिंह के एक बड़े दस्ते का नेतृत्व हाकिम खां सूरी कर  रहे थे (  शेर शाह सूरी के समय से सुरवंश एवं मुगलों में परम्परागत शत्रुता चली आ रही थी ) मुग़ल सेना में राजपूत सैनिक भी थे हाकिम खां के नेतृत्व में प्रताप की सेना मुग़ल सेना में  ऐसे घुलमिल गया की कौन राजपूत मुग़ल के साथ है और कौन प्रताप सिंह के साथ निर्णय करना मुश्किल हो गया . इस परिस्थिति में मुग़ल सैनिक बदायूनी  ने आसफ खां से विचार विमर्श किया इस पर आसफ खां ने निर्देश दिया की बिना इस बात की चिंता किए कौन किस दल का राजपूत है अंधा धुंध तीर गोले चलाओ राजपूत किसी ओर की मरे फ़ायदा इस्लाम का होगा ,और  वीर हाकिम खां सूरी प्रताप के लिए लड़ते लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी .

         राजपूती रक्त बहते देखकर मुग़ल सेनापति मान सिंह हैरान , परेशान अजीब उधेड़ बुन में थे चेतक पर सवार प्रताप सिंह अचानक मान सिंह के सामने प्रकट हो गया , चेतक अपने आगे के दोनों पैर को मान सिंह की हाथी के सूड पर रखा दिया प्रताप ने तुरंत भाले से मान सिंह पर वार कर दिया , चैतन्य मानसिंह फुरती से हटकर अपना प्राण बचाया परन्तु महावत मारा गया

          हाथी के सूंड में बंधे तलवार से चेतक का दोनों पैर घायल हो गया , इसी बीच  शत्रु सेना से घिरे प्रताप को देखकर सरदार झाला प्रताप सिंह की रक्षा के लिए आ गया और राणा प्रताप का राज क्षत्र को अपने सर में रखकर प्रताप को वहां से जाने के लिए विवास कर दिया , मुग़ल सेना राज क्षत्र  पहने सरदार झाला को प्रताप समझकर अंधा धुंध तीर और भाला का बौक्षर कर दिया और सरदार झाला वीर गति को प्राप्त कर  अमर हो गया .

         हल्दी घाटी से तीन  मील दूर अपने स्वामी को  पहुंचाकर स्वामी भक्त चेतक प्राण त्याग दिया . दो मुग़ल सैनिक प्रताप के पीछे थे तभी प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह वहा  पहुंचकर दोनों मुग़ल सैनिक को मार गिराया और अपने भाई को प्रताप ने अपने बाहुपास  में बांध लिया , शक्ति सिंह ने अपना घोड़ा देकर मेवाड़ केसरी  प्रताप को रवाना किया .

     रण क्षेत्र  से प्रताप के चले जाने के बाद भी वीर राजपूत मुग़ल सैनिको को गाजर मुली की तरह काटते रहे शाही सेना मैदान छोड़ भागने की स्थिति में आ गया तभी किसी ने शोर मचाया बादशाह आ गए , जिससे शाही फ़ौज का हौसला बुलंद हो गया और मेवाड़ की सेना के पांव उखड गया

         यद्यपि हल्दी घाटी में शाही सेना को तथाकथित विजय मिली , परन्तु अकबर जिस उद्देश्य / लक्ष्य को लेकर युद्ध लड़ा वह पूरा नहीं हो सका महाराणा प्रताप सिंह न मारा जा सका और नहीं मुग़ल  सेना के पकड़ में आया . इस युद्ध ने प्रताप के संकल्प को दृढ़ किया तथा अधिक संख्या वाले सेना से खुले मैदान में लड़ने के बजाय छापा मार प्रणाली अपनाया .


 

(इतिहास के पन्नो से)

कुछ भाग आगामी अंक में 

---- प्रतीक्षा करें 


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