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VIDHAVA VIVAH - RAJPUT KSHATRANI

Posted by bsbaghel on December 5, 2012 at 12:25 PM

विधवा-विवाह और राजपूत क्षत्राणी 

 राजपूत क्षत्रिय समाज के कुछ लोग हीन भावना से इतने ग्रषित है कि दुसरे वर्ग या वर्ण के समाजों के

पैमाने से क्षत्रिय समाज की परम्पराओं ,मान्यताओं ,कर्त्यव निष्ठां ,धर्म पालन,यहाँ तक की  क्षत्रिय  

धर्म की आधार शिला एवं  क्षत्रिय धर्म की जननी परिवार एवं वैवाहिक संस्था तक को आधुनिकता,

नारी के समान अधिकारों के नाम पर विधवा हित चिन्तक बनकर क्षत्राणी को भी अबला, निस्सहाय,

आदि शब्द देकर उन्हें  अन्य समाजो के पैमानों पर कषने का दु :साहस कर रहे है,वे तथाकथित हित

चिन्तक  कुछ  सवालों  का जवाब देने का कष्ट करें ,

(1) सर्व प्रथम  बताये कि किसी विधवा क्षत्राणी के पूर्ण अधिकार जिसकी वह है अधिकारिणी है , नये

पतिदेव प्रदान करेंगे ? अर्थात उसे  अपने पूर्व मृत पति का श्राद्ध कर्म करने का अधिकार  मिलेगा ?

(2) क्या वह क्षत्राणी अपने पूर्व सास श्वसुर की सेवा करने के लिए स्वतन्त्र होगी ?

(3) पुनर्विवाह किस उम्र तक की क्षत्राणी को करना चाहिए ?

(4) किस विधवा को पुनर्विवाह करने की छूट होगी ? अर्थात  आर्थिक रूप से कमजोर , संतानहीन ,

1 बच्चे की माँ ,2 बच्चे की माँ , या फिर वृद्धावस्था में जब बच्चे भी ठुकरा दे ?

(5) यदि विधवा का विवाह केवल इस आधार पर करने की वकालत की जा रही हो कि "सारी जवानी

कैसे कटेगी ?" तो उनके बारे में क्या व्यवस्था की जा रही है जो पति के जीवित रह कर भी सूर्यास्त

होते ही मदिरा की गोद में चले जाते है क्या उनकी पत्नियों को भी यह आजादी मिलेगी ?

(6) या फिर वर्ष के 10 माह राष्ट्र की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात है क्या उनकी पत्नियों को भी

अस्थायी विवाह करने की  आजादी मिलेगी ?

(7) अन्य समाजो के पैमाने को अपनाने  वालो ने इस बात पर गौर किया है की  नहीं  विवाह के

प्रारम्भ में  सभी को सामंजस्य बैठाने में थोडा समय लगता है , अतः जब अन्य समाजों में आये दिन 

पत्नि अपने पति को ठुकरा रही है तब पुनर्विवाह चलन में होने पर यह बुराई हमारे समाज में भी एक

भयावह रूप क्यों नहीं लेगी ?

( 8) विधवा को एक देवी और तपस्विनी की तरह सम्मान मिलने की स्थिति में पुनर्विवाह से अधिक

सक्षम और समर्थ क्षत्राणी (राजमाता कुन्ती ) क्यों स्वीकार नहीं है आपको ?

एक पत्नि व्रती  से भी क्षत्रिय समाज भरा पड़ा ---- महाराज हरिचन्द्र जी ,स्वयं सर्वश्रेष्ट क्षत्रिय श्री राम ,

राजर्षि मधुसुधन दास  जी महाराज जैसे  हजारो क्षत्रिय है . 

कोई शंका या वाद - विवाद  है आमने सामने बैठकर विचार हो सकता है मै  क्षत्राणी और सिर्फ क्षत्राणी

की ही बात  कर सकता हूँ , मै  ऐसे किसी तर्क से सहमत नहीं जो क्षत्राणी को अबला,बेचारी,निस्सहाय

,या अकेले सतीत्व की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध करने का प्रयास करे ,

यदि कोई यह कहता या सोचता हो कि केवल पति के कारण क्षत्राणी अपने सतीत्व की रक्षा कर सकती

है तो यह उसका बहम है इसे वह आज और अभी अपने जेहन से निकाल दे,

क्योंकि संसार का कोई व्यक्ति युधिष्ठर ,भीम,अर्जुन,नकुल और सहदेव की सयुंक्त शक्ति से अधिक

शक्तिशाली नहीं हो सकता फिर भी  द्रौपदी की लाज बचाने में सफल नहीं हो पाये , द्रौपदी के सतीत्व

की रक्षा उसके  स्वयं के तेज़ ने की  .,

श्री  राम से बड़ा कोई योद्धा नहीं किन्तु फिरभी माता सीता के ऊपर रावण  ने कुदृष्टि  डाली तब 

माता सीता के तेज़ से ही उनके सतीत्व की रक्षा हुयी .

 वर्तमान और आज के युग की सोनिया गाँधी के पीहर और ससुराल दोनों कुलों में विधवा विवाह पर

कोई रोक टोक नहीं है . 

क्या यह  उदाहरण  पर्याप्त नहीं कि नारी यदि सक्षम है तो उसे विधवा विवाह की कोई जरुरत नहीं क्या

क्षत्राणी , सोनिया गांधी के बराबर भी सक्षम नहीं बन सकती फिर धिक्कार है ऐसे क्षत्रित्व पर

आज आवश्यकता है राजपूत कन्याओ को सक्षम,समर्थ बनाया जाये ,उन्हें इतना समर्थ और सक्षम

बना दिया जाये की स्वयं धर्म्, न्याय  और  समाज उसकी ओर देखे  ,न कि क्षत्राणी किसी आसरे की

खोज करती फिरे।

क्षत्राणी कोई गाय नहीं है कि उसे खूंटा उखड जाने पर दुसरे ,तीसरे में  बाँधते फिरे . जिनमे क्षत्रित्व

नहीं वे पति के मरने का भी क्यों इंतजार करे, नहीं पसंद आ रहा तो क्या जरुरत है सामंजस्य की उसके

जीते जी करे  दूसरा ,तीसरा हम  सिर्फ और सिर्फ क्षात्र धर्म पालकों की बात कर रहें जो सामाजिक,

धार्मिक वर्जनाओ को नहीं मानना चाहते उन्हें कोई नहीं रोक रहा है वे  स्वतन्त्र है , स्वछंद रहे  क्या

जरुरत है  समाज की ?

"जय क्षात्र धर्म "

 

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