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विचार वीथी - राजपूत क्षत्रिय महासभा का ब्लॉग.
कृपया यह ध्यान रखें कि यहां व्यक्त विचार इस ब्लॉग में लिखने वाले लेखकों के अपने विचार हैं . आवश्यक नहीं है कि, राजपूत क्षत्रीय महासभा की इन विचारों से सहमत ही हो .. अपने विचार व्यक्त करते समय मर्यादा और शालीनता का ध्यान रखें और किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न करें .
RANI LAXMI BAI
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खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
(जन्म- 19 नवंबर 1835 , वीरगती- 17 जून 1858 )
हिन्दुस्तान की गुलामी का संक्रमण काल देश भक्त वीरों के मन मे भारत माता को स्वतंत्र कराने की प्रबल दृढ इच्छा शक्ति क्या बुढे, जवान, नवयुवक , बच्चे,दादी ,नानी, मां, बहन , नवयुवती सभी के मन मे भारत माता को अंग्रेजो के गुलामी से मुक्त कराने की चाह हिलोरे ले रही थी ।बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने खून से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिख दी । बलिदानों की धरती भारत मे ललनाएं भी स्वतंत्रता संग्राम मे पीछे नही रही ।
ऎसे मे झांसी की रानी लक्ष्मी बाई स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वीरांगना भारत माता को स्वतंत्र कराने महल से निकल पडी जंगल पहाड एवं खेतो की पगडंडीयो मे उन्होंने न केवल भारत बल्कि पुरे विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है। रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी राज्य की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास प्रारंभ हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे। अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का गठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया ।
17 जून, 1858 का वह दिन घायल रानी लक्ष्मी बाई असहनीय वेदना से क्लांत थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कांती से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र की ओर देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए और क्रान्ति की वह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता सजायी गई और उनके पुत्र दामोदर राव ने भारत माता की वीर सपूती को मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। क्रांतीकारी नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उनकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई थी ।
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी ।
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी।।
गुमी हुई आज़ादी की कीमत हम सबने पहचानी थी।
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
Nathu Ram Godasey : ANTIM BAYAN
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"मैंने गाँधी को क्यों मारा " ? नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान,,,,
{ इसे सुनकर अदालत में उपस्थित सभी लोगो की आँखे गीली हो गई थी और कई तो रोने लगे थे एक जज महोदय ने अपनी टिपणी में लिखा था की यदि उस समय अदालत में उपस्थित लोगो को जूरी बनाया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता तो निसंदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्देश देते }
नाथूराम ने कोर्ट में कहा -- सम्मान ,कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमे अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है .मै कभी यह नहीं मान सकता कि किसी आक्रामक का शसस्त्र प्रतिरोध करना गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है .प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करने , मै एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूं .मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे थे . या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक ,मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये .वे अकेले ही प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे .महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे .गाँधी ने मुस्लिमो को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सोंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया .गाँधी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिन्दुओ की कीमत पर किये जाते थे जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और समाज वाद का दंभ भरा करती थी .उसी ने गुप्त रूप से बन्दुक की नोक पर पकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया .मुस्लिम तुष्टिकरण की निति के कारण भारत माता के टुकड़े कर दिए गए और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई . नेहरू तथा उनकी भीड़ की स्वीकार्यता के साथ ही एक धर्म के आधार पर राज्य बना दिया गया . इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई स्वतंत्रता कहते है किसका बलिदान ? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गाँधी के सहमती से इस देश को काट डाला ,जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया .में साहस पूर्वक कहता हूँ की गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए उन्होंने स्वयं को पकिस्तान का पिता होना सिद्ध किया .
मै कहता हूँ की मेरी गोलिया एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थी ,जिसकी नित्तियो और कार्यो से करोडो हिन्दुओ को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला ऐसे कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके इसलिये मैने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया ..............मै अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा ,जो मैने किया उस पर मुझे गर्व है . मुझे कोई संदेह नहीं है की इतिहास के इमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तौल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मुल्यांकन करेंगे .
जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीचे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन मत करना
DAHEJ - dowari
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दहेज प्रथा
नन्ही सी कली
एक नन्ही सी कली, धरती पर खिली
लोग कहने लगे, पराई है पराई है !
जब तक कली ये डाली से लिपटी रही
आँचल मे मुँह छिपा कर, दूध पीती रही
फूल बनी, धागे मे पिरोई गई
किसी के गले में हार बनते ही
टूट कर बिखर गई
ताने सुनाये गये दहेज में क्या लाई है
पैरों से रौन्दी गई
सोफा मार कर, घर से निकाली गई
कानून और समाज से माँगती रही न्याय
अनसुनी कर उसकी बातें
धज्जियाँ उड़ाई गई
अंत में कर ली उसने आत्महत्या
दुनिया से मुँह मोड़ लिया
वह थी, एक गरीब माँ बाप की बेटी ।
(अज्ञात)
MOTHER ( MAA ) - SWAMI VIVEKANAND
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माँ को समर्पित स्वामी विवेकानंद की आत्म कथा
स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया," माँ की महिमा संसार में किस कारण से गाई जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेरवजन का एक पत्थर ले आओ | जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, "अब इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बादमेरे पास आओ तो मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा | "स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया | पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा,किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई | शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा | थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा | एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता |"स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और गृहस्थी का सारा काम करती है और उफ़ तक नहीं बोलती | संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं |
किसी कवि ने सच ही कहा है : -
जन्म दिया है सबको माँ ने पाल-पोष कर बड़ा किया |
कितने कष्ट सहन कर उसने, सबको पग पर खड़ा किया | |
माँ ही सबके मन मंदिर में, ममता सदा बहाती है |
बच्चों को वह खिला-पिलाकर, खुद भूखी सो जाती है | |
पलकों से ओझल होने पर, पल भर में घबराती है|
जैसे गाय बिना बछड़े के, रह-रह कर रंभाती है | |
छोटी सी मुस्कान हमारी, उसको जीवन देती है |
अपने सारे सुख-दुःख हम पर न्योछावर कर देती है | |
यदि घर में रोटी के चार तुकडे हो और खाने वाले पांच , तब माँ ही वह शख्सियत होती है जो कहती है मुझे भूख नहीं है तुम सब खा लो
RAJPUT KSHATRIY SHAKTI & DHARM
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क्षत्रिय शक्ति और धर्म
राजपूत क्षत्रिय का स्वधर्म
नव वर्ष की स्वागत एवं शुभकामनाए ,
भारत की सभ्यता अति प्राचीन है। यह युगों-युगों से अनेक उत्थान-पतन की परिस्थितियों से गुजर चुकी है। हमनें उनसे प्रेरणाऐं भी लीं और सबक भी सीखे। यह मानवतावादी, विश्ववादी, न्याय ,प्रेम, करुणा का देश धर्म एवं जाति प्रधान है। यह देश बाहरी दुनिया के अनेक कौमों का राजनैतिक, आर्थिक गुलाम तो रहा लेकिन इसकी मूल आत्मा जो संस्कृति एवं आध्यात्म में थी इसलिए इसका अस्तित्व आज भी जिन्दा है लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद यह देश जिन यूरोपीय, अमेरिकी देशों की नीतियां को अपनाकर अपने ही हाथो अपना आत्मघात / आत्मविनाश कर रहा है, वे अब सहन नहीं की जा सकती । यूरोपीय नीतियों के सदियों पुराने प्रभाव के कारण एक बहुत बड़ा वर्ग उसका प्रवक्ता बन गया है। ऐसे लोग केवल आर्थिक लाभ के लिए स्वयं ही गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज भी एक उपेक्षित क्षत्रिय बुद्धिजीवी वर्ग इन यूरोपीय नीतियों का घोर विरोधी है जो शक्ति हीनता के कारण लड़ने में सक्षम नहीं है। उसे नई शक्ति देने के लिए भारत की एक विशिष्ट राजनैतिक जाति क्षत्रिय राजपूत राष्ट्र और विश्व को धर्म, संस्कृति और राजनीति को नई दिशा देने के लिए जन्म ले रही है। अधोगति प्राप्त राजनैतिक चेतना से शून्य समाज में उपेक्षित तथा आजादी के बाद हर तरफ से पीडि़त इस महान जाति को एक महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए जागृत करने और अपनी परंपरा के अनुसार देश धर्म के लिए बलिदान देने के लिए तैयार करने का यह छोटा सा प्रयास है। जिस प्रकार कभी विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध आज के पंजाब प्रदेश की महान बलिदानी जातियों जाटों, सिक्खों, राजपूतों को महान गुरुओं ने अपना बलिदान देकर बलिदान देने के लिए तैयार किया था। जब-जब इस देश में जाति और धर्म के नाम पर अन्याय, अत्याचार हुए तब-तब इसी जाति में युग पुरुष पैदा हुए जैसे-भगवान बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह आदि जिन्होंने मानव जाति को अन्याय अत्याचार से मुक्त कराया। हमें पुनः एक बार इस विकृत जाति एवं पंथवाद से मुक्त वेदान्त पर आधारित विश्व की पुर्नरचना के लिए इन जातियों और पंथों को मानवता की ओर मोड़ना होगा और अपने राष्ट्र तथा विश्व के अनेक धर्मों के साथ समन्वय स्थापित करना होगा।
वर्ण विज्ञान के अनुसार क्षत्रिय शक्ति का प्रतीक है। शक्ति के बिना ज्ञान नपुंसक है। दुर्भाग्य से भारत एक हजार वर्ष से श्री एवं शक्तिहीन हो गया है। इसके लिए कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है, हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। इसलिए पुनः शक्तिवान बनने के लिए किसी दूसरे की ओर ताकना नहीं है , बल्कि सिर्फ अपने क्षत्रिय धर्म का आचरण निर्वाह करना है। जब आप क्षत्रिय धर्म का पालन करेंगे तो सम्पूर्ण समाज आपको नेतृत्व भी सौपेंगा। धर्म और वर्ण धर्म के उदय का पूर्ण अवसर आ गया है। जो इसको पहचानेंगे और क्षात्र धर्म का आचरण करेंगे वे समाज में अपना स्थान बनायेंगे। जो युग धर्म नहीं पहचानेंगे, वे पिछड़ जायेंगे और स्वयं दलित हो जायेंगे। क्षत्रिय केवल सामान्य मानव नहीं बल्कि विशिष्ट मानव के रूप में पहचाने जाते हैं इसलिए हमें अपने राष्ट्रीय मानव कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। हमें अपनी शक्ति को राष्ट्रहित में लगाने की तैयारी करनी है। अपनी युवा शक्ति को ज्ञान एवं शक्ति से सम्पन्न बनाकर प्रशिक्षित करना है ताकि ये अपने स्वधर्म का पहचाने।
भोग परायण संस्कृति के विरुद्ध आम आदमी जो शोषण और दमन का शिकार हो रहा है के लिए क्षत्रियों को आगे आना होगा इससे पूरा विश्व क्षात्र धर्म को समझेगा और मानवता को शोषण से मुक्ति मिलेगी। आज क्षत्रिय राजनैतिक आर्थिक अधिकारों से भी वंचित है और संख्या की राजनीति में शक्तिहीन हो गये हैं। इसके अलावा क्षत्रियों के अस्तित्व पर राजनैतिक, आर्थिक, संस्कृतिक हमले हो रहे हैं। इससे क्षत्रिय शक्तिहीन एवं प्रताड़ित हो रहा है। राष्ट्र की रक्षा करने वाले ही यदि स्वयं शक्तिहीन हो जायेंगे तो समाज की रक्षा कौन करेगा। इसलिए जागो, उठो और अपनी एवं राष्ट्र की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान की तैयारी करो। किसी कौम के सामने जब ऐसे संकट खड़े होते हैं तब या तो वो हमेशा के लिए दासत्व स्वीकार कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लेती है अथवा इन चुनौतियों का जबाव देने के लिए फिर उठ खड़ी होती है। आज क्षत्रियों को पुनः उठ खड़ा होना है या अपने कुल, गौरव, मान मर्यादाओं एवं संस्कृति को छोड़कर नष्ट हो जाना है।
हम अपना एक नया इतिहास बना सकते हैं हमें सदैव आशावादी होना चाहिए। निराशा का नाम ही मृत्यु है यह किसी भी व्यक्ति अथवा समाज पर लागू होती है। हमें अन्तर्राष्ट्रीय क्षत्रिय महासभा द्वारा चलाये जा रहे मिशन राजपूत इन एक्शन के इस संघर्ष में अपने सजातीय बुद्धिजीवियों को मार्गदर्शन तथा व्यापारियों का आर्थिक सहयोग लेना है यही युगधर्म है।
वर्तमान युग परिवर्तन की घड़ी में क्षत्रियों को अपना राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्य समझना होगा। इतिहास और महापुरुषों से प्रेरणा लेनी होगी। हमारे यहां आदिकाल से लोक कल्याणकारी राजतन्त्र रहा है। उसकी अपनी मर्यादाऐं थीं। जिसे सामन्ती युग कहते हैं उस सामन्त शब्द का जन्म विदेशी बर्बर कौमों के गुलामी के काल में हुआ। सामन्त शब्द पश्चिम की देन है जब तक समाज रहेगा समाज की व्यवस्था के लिए एक संचालन सूत्र रहेगा। भारत के अतीत का समाज विज्ञान पूर्ण और धर्म आधारित है। इसीलिए हमें अपने अतीत मानव कल्याणकारी क्षत्रिय वर्ण धर्म के पुर्नउत्थान साहसपूर्वक अपने विचारों को जगत में रखना चाहिए। आधुनिक भारत में क्षत्रियों को क्षात्र धर्म अपनाना होगा यदि क्षत्रियों ने अपना स्वधर्म अपना लिया तो दुनिया की कोई ताकत नहीं जो राज्य व्यवस्था का संचालन सूत्र उनके हाथ से छीन सके। इतिहास में भगवानों के रूप में जिनकी पूजा हुई और हो रही है वे सब क्षत्रिय पुत्र ही हैं। बौद्ध और जैनों ने तो भावी युगों के लिए यह कहा है कि आगे आने वाले युगों में क्षत्रियों में ही भगवान बुद्ध और महावीर आयेंगे। आधुनिक युग के संदर्भ में पृथ्वीराज चैहान, राणा प्रताप, शिवाजी, दुर्गादास राठौर, गुरु गोविन्द सिंह जैसे क्षत्रिय आयेंगे। इतनी महान ऐतिहासिक पूंजी के वारिस अपने क्षत्रिय धर्म को पहचानें । भारत और विश्व जननी भारत माता की निगाहें इसी क्षत्रिय पुत्र के अवतरण की प्रतीक्षा कर रही हैं।
विराट क्षत्रिय समाजः-
वे सब सैनिक जातियां जो अपने आर्थिक पिछड़ेपन के कारण पिछड़े वर्ग में आती हैं वे सब जातियां जिनका चरित्र लड़ाकू है और जिनके राज्य भी रहे हैं विराट क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग है लेकिन ऐतिहासिक तथा आर्थिक कारणों से हम टूट गये हैं। हमको पुनः एकीकरण के लिए काम करना होगा स्मरण रहे कि इतिहास ने हमारे अनेक भाईयों को हमसे अलग किया है। हमें हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने गले लगाना होगा तभी हमारी शक्ति बनेगी यदि वे सभी क्षत्रिय जातियां संगठित हो जायें तो क्षत्रिय संख्या की दृष्टि से भी शक्तिशाली हो जायेंगे। यदि क्षत्रिय शक्ति संघर्ष करे तो ये वर्ण अपने खोये हुए स्थान को पुनः प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि अभी तक यह वर्ग पश्चिम के वैचारिक हथियारों से लड़ते रहे हैं, इसलिए विफल भी रहे हैं। अब ये शक्तियां जागृत हो रही हैं और वह अपने भारतीय विचारों के हथियारों से लड़ने को तैयार है। अन्तराष्ट्रीय महासभा द्वारा चलाया जा रहा मिशन राजपूत इन एक्शन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानव कल्याण के लिए हितकर सिद्ध होगा।
VIDHAVA VIVAH - RAJPUT KSHATRANI
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विधवा-विवाह और राजपूत क्षत्राणी
राजपूत क्षत्रिय समाज के कुछ लोग हीन भावना से इतने ग्रषित है कि दुसरे वर्ग या वर्ण के समाजों के
पैमाने से क्षत्रिय समाज की परम्पराओं ,मान्यताओं ,कर्त्यव निष्ठां ,धर्म पालन,यहाँ तक की क्षत्रिय
धर्म की आधार शिला एवं क्षत्रिय धर्म की जननी परिवार एवं वैवाहिक संस्था तक को आधुनिकता,
नारी के समान अधिकारों के नाम पर विधवा हित चिन्तक बनकर क्षत्राणी को भी अबला, निस्सहाय,
आदि शब्द देकर उन्हें अन्य समाजो के पैमानों पर कषने का दु :साहस कर रहे है,वे तथाकथित हित
चिन्तक कुछ सवालों का जवाब देने का कष्ट करें ,
(1) सर्व प्रथम बताये कि किसी विधवा क्षत्राणी के पूर्ण अधिकार जिसकी वह है अधिकारिणी है , नये
पतिदेव प्रदान करेंगे ? अर्थात उसे अपने पूर्व मृत पति का श्राद्ध कर्म करने का अधिकार मिलेगा ?
(2) क्या वह क्षत्राणी अपने पूर्व सास श्वसुर की सेवा करने के लिए स्वतन्त्र होगी ?
(3) पुनर्विवाह किस उम्र तक की क्षत्राणी को करना चाहिए ?
(4) किस विधवा को पुनर्विवाह करने की छूट होगी ? अर्थात आर्थिक रूप से कमजोर , संतानहीन ,
1 बच्चे की माँ ,2 बच्चे की माँ , या फिर वृद्धावस्था में जब बच्चे भी ठुकरा दे ?
(5) यदि विधवा का विवाह केवल इस आधार पर करने की वकालत की जा रही हो कि "सारी जवानी
कैसे कटेगी ?" तो उनके बारे में क्या व्यवस्था की जा रही है जो पति के जीवित रह कर भी सूर्यास्त
होते ही मदिरा की गोद में चले जाते है क्या उनकी पत्नियों को भी यह आजादी मिलेगी ?
(6) या फिर वर्ष के 10 माह राष्ट्र की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात है क्या उनकी पत्नियों को भी
अस्थायी विवाह करने की आजादी मिलेगी ?
(7) अन्य समाजो के पैमाने को अपनाने वालो ने इस बात पर गौर किया है की नहीं विवाह के
प्रारम्भ में सभी को सामंजस्य बैठाने में थोडा समय लगता है , अतः जब अन्य समाजों में आये दिन
पत्नि अपने पति को ठुकरा रही है तब पुनर्विवाह चलन में होने पर यह बुराई हमारे समाज में भी एक
भयावह रूप क्यों नहीं लेगी ?
( 8) विधवा को एक देवी और तपस्विनी की तरह सम्मान मिलने की स्थिति में पुनर्विवाह से अधिक
सक्षम और समर्थ क्षत्राणी (राजमाता कुन्ती ) क्यों स्वीकार नहीं है आपको ?
एक पत्नि व्रती से भी क्षत्रिय समाज भरा पड़ा ---- महाराज हरिचन्द्र जी ,स्वयं सर्वश्रेष्ट क्षत्रिय श्री राम ,
राजर्षि मधुसुधन दास जी महाराज जैसे हजारो क्षत्रिय है .
कोई शंका या वाद - विवाद है आमने सामने बैठकर विचार हो सकता है मै क्षत्राणी और सिर्फ क्षत्राणी
की ही बात कर सकता हूँ , मै ऐसे किसी तर्क से सहमत नहीं जो क्षत्राणी को अबला,बेचारी,निस्सहाय
,या अकेले सतीत्व की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध करने का प्रयास करे ,
यदि कोई यह कहता या सोचता हो कि केवल पति के कारण क्षत्राणी अपने सतीत्व की रक्षा कर सकती
है तो यह उसका बहम है इसे वह आज और अभी अपने जेहन से निकाल दे,
क्योंकि संसार का कोई व्यक्ति युधिष्ठर ,भीम,अर्जुन,नकुल और सहदेव की सयुंक्त शक्ति से अधिक
शक्तिशाली नहीं हो सकता फिर भी द्रौपदी की लाज बचाने में सफल नहीं हो पाये , द्रौपदी के सतीत्व
की रक्षा उसके स्वयं के तेज़ ने की .,
श्री राम से बड़ा कोई योद्धा नहीं किन्तु फिरभी माता सीता के ऊपर रावण ने कुदृष्टि डाली तब
माता सीता के तेज़ से ही उनके सतीत्व की रक्षा हुयी .
वर्तमान और आज के युग की सोनिया गाँधी के पीहर और ससुराल दोनों कुलों में विधवा विवाह पर
कोई रोक टोक नहीं है .
क्या यह उदाहरण पर्याप्त नहीं कि नारी यदि सक्षम है तो उसे विधवा विवाह की कोई जरुरत नहीं क्या
क्षत्राणी , सोनिया गांधी के बराबर भी सक्षम नहीं बन सकती फिर धिक्कार है ऐसे क्षत्रित्व पर
आज आवश्यकता है राजपूत कन्याओ को सक्षम,समर्थ बनाया जाये ,उन्हें इतना समर्थ और सक्षम
बना दिया जाये की स्वयं धर्म्, न्याय और समाज उसकी ओर देखे ,न कि क्षत्राणी किसी आसरे की
खोज करती फिरे।
क्षत्राणी कोई गाय नहीं है कि उसे खूंटा उखड जाने पर दुसरे ,तीसरे में बाँधते फिरे . जिनमे क्षत्रित्व
नहीं वे पति के मरने का भी क्यों इंतजार करे, नहीं पसंद आ रहा तो क्या जरुरत है सामंजस्य की उसके
जीते जी करे दूसरा ,तीसरा हम सिर्फ और सिर्फ क्षात्र धर्म पालकों की बात कर रहें जो सामाजिक,
धार्मिक वर्जनाओ को नहीं मानना चाहते उन्हें कोई नहीं रोक रहा है वे स्वतन्त्र है , स्वछंद रहे क्या
जरुरत है समाज की ?
"जय क्षात्र धर्म "
TRUE INDIAN HISTORY - BEFORE BRITISH
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अंग्रेजो से पहले भारत का सच
उत्कृष्ट अमेरिकी इतिहासकार विलियम डुरंट ने इतिहास में भारत पर ब्रिटिश शासन को सबसे बड़ा अपराध बताया . उन्होंने खुले दिल से भारत के पक्ष और ब्रिटिशों के विरूध्द लिखा था। विल डुरंट विश्व प्रसिध्द महान इतिहासकार और दार्शनिक माने जाते हैं,विल डुरंट के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनके द्वारा लिखित ग्यारह खण्डों वाली ‘दि स्टोरी ऑफसिविलाइजेशन‘ श्रृंखला है, जो उन्होंने अपनी पत्नी एरियल के साथ मिलकर लिखी है। विल और एरियल को सन् 1968 में जनरल नॉन-फिक्शन के लिए पुल्तिज़र पुरस्कार मिला।
गांधीजी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें कृतज्ञता भरे पत्र लिखे थे। ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक को भारत में प्रतिबंधित कर दिया था।अनेकों को संभवतया यह पता नहीं होगा कि अठारहवीं शताब्दी में जब अंग्रेज भारत आए तब देश राजनीतिक रूप से कमजोर था लेकिन आर्थिक रूप से धनवान था।
jabez-sunderland सुडरलैण्ड ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में उस सम्पदा के बारे में लिखा जो कि क्षत्रिय सासको ने व्यापक और विभिन्न उद्योगों से सृजित की थी।”भारत, यूरोप या एशिया के किसी अन्य देश की तुलना में एक महानतम औद्योगिक और उत्पादक राष्ट्र था। इसका टेक्सटाइल सामान-इसके लूम से उत्पादित बेहतर उत्पादन, कॉटन, वूलन, लीनन और सिल्क-सभ्य विश्व में प्रसिध्द थे: इसी प्रकार इसकी आकर्षक ज्वैलरी और प्रत्येक प्रिय आकार में उसके बहुमूल्य नग, उसी प्रकार पोट्ररी, पोरसेलिन्स, सिरेमिक्स-सभी प्रकार के, गुणवत्ता, रंग और सुंदर आकार में। धातु में इसका उत्तम काम-लौह, स्टील, चांदी, और सामान में। महान वास्तु-दुनिया के किसी अन्य के बराबर सुंदर। महान इंजीनियर , व्यापारी, व्यवसायी, बैंकर और फाइनेंसर्स। यह न केवल पानी के जहाज बनाने वाला महान राष्ट्र था अपितु सभी ज्ञात सभ्य देशों के साथ इसका विशाल व्यवसायिक और व्यापारिक सम्बन्ध था।
ऐसा भारत अंग्रेजों ने अपने आगमन पर पाया।‘दि केस फॉर इण्डिया‘ की प्रस्तावना में डुरंट लिखते हैं:”एक ऐसे व्यक्ति जिसके सांस्कृतिक इतिहास को समझने के लिए मैं भारत गया ताकि दि स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन लिख सकूं……लेकिन मैंने भारत में ऐसी चीजें देखी कि मुझे महसूस हुआ कि मानवता के पांचवे हिस्से वाले लोगों-जो गरीबी और दमन से इस कदर कुचले हुए थे जैसे कि धरती पर कहीं अन्य नहीं है, के बारे में अध्ययन और लिखना बेमानी है। मैं डरा हुआ था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी सरकार के लिए अपने नागरिकों को ऐसे कष्टों के लिए छोड़ना भी संभव होगा।
”मैं वर्तमान भारत और उसके समृध्द अतीत का अध्ययन करने के संकल्प के साथ आया: इसकी अद्वितीय क्रांति जो पीड़ाओ के साथ लड़ी गई लेकिन कभी वापस नहीं आई के बारे में और सीखने के: आज के गांधी और बहुत पहले के बुध्द के बारे में पढ़ने के लिए। और जितना ज्यादा मैं पढ़ता गया मैं विस्मय और घृणा के साथ-साथ क्रोध से भी भरता गया यह जानकर कि डेढ़ सौ साल में इंलैण्ड द्वारा भारत को जानबूझकर लहूलुहान किया गया है। मैंने यह महसूस करना शुरु किया कि मैं सभी इतिहास के सर्वाधिक बड़े अपराध को देख रहा हूं।”
डुरंट ने सुंडरलैण्ड के विस्तृत रुप से संदर्भ दिया है और कहा कि ”जिन्होंने हिन्दुओं की अकल्पनीय गरीबी और मनोवैज्ञानिक कमजोरी को देखा आज मुश्किल से विश्वास करेगा कि यह अठारहवीं शताब्दी के भारत की सम्पदा थी जिसने इंग्लैण्ड और फ्रांस के पेशेवर समुद्रीय लुटेरों को इसकी तरफ आकर्षित किया था।”
डुरंट कहते हैं कि यही वह दौलत थी जिसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी हथियाने को आतुर थी। 1686 में पहले ही ईस्ट इंडिया कम्पनी के निदेशकों ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। सदा-सर्वदा के लिए ”भारत में एक विशाल, सुव्यवस्थित अंग्रेज अधिपत्य स्थापित करने हेतु।”सन् 1757 में रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी में बंगाल के राजा को हराया और अपनी कम्पनी को भारत के इस अमीर प्रांत का स्वामी घोषित किया। डुरंट आगे लिखते हैं: क्लाइव ने धोखाधड़ी और संधियों का उल्लंघन कर, एक राजकुमार को दूसरे से लड़ाकर, और खुले हाथों से घूस दे लेकर-क्षेत्र को फैलाया । कलकत्ता से एक पानी के जहाज के माध्यम से चार मिलियन डॉलर भेजे गए। उसने हिन्दू शासकों जो उसके और उसकी बंदूकों पर आश्रित थे से 11,70,000 डॉलर ‘तोहफे‘ के रुप में स्वीकार किए: इसके अलावा 1,40,000 डॉलर का वार्षिक नजराना । वह कहते हैं ”जब मैं उस देश के अद्भुत वैभव के बारे में सोचता हूं और तुलनात्मक रुप से एक छोटा सा हिस्सा जो मैंने लिया तो मैं अपने संयम पर अचम्भित रह जाता हूं।” यह निष्कर्ष था उस व्यक्ति का जो भारत में सभ्यता लाने का विचार रखता था।
भारत-विश्लेषक अक्सर भारत की जाति-व्यवस्था के बारे में काफी अपमानजनक ढंग से बात करते हैं। हालांकि विल डुरंट जातिवादी उपमा को भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य को इतिहास में सर्वाधिक बड़े अपराध की अपनी निंदा को पुष्ट करने के रुप में करते हैं।
”दि कांस्ट सिस्टम इन इंडिया” उपशीर्षक के तहत डुरंट लिखते हैं:
”भारत में वर्तमान वर्ण व्यवस्था चार वर्गों से बनी है: असली ब्राह्मण है ब्रिटिश नौकरशाही; असली क्षत्रिय है ब्रिटिश सेना, असली वैश्य है ब्रिटिश व्यापारी और असली शूद्र तथा अस्पृश्य हैं हिन्दू लोग।”
पहली तीन जातियों के बारे में निपटने के बाद लेखक लिखता है: ”भारत में असली वर्ण व्यवस्था का अंतिम तत्व अंग्रेजों द्वारा हिन्दुओं के साथ सामाजिक व्यवहार है। अंग्रेज जब आए थे तब वे प्रसन्न अंग्रेजजन थे, सही ढंग से व्यवहार करने वाले भद्रपुरुष; लेकिन उनके नेताओं के उदाहरण तथा गैर-जिम्मेदार शक्ति के जहर से वह शीघ्र ही इस धरती पर सर्वाधिक घमण्डी तथा मनमानी करने वाली नौकरशाही में परिवर्तित हो गए। 1830 में संसद को प्रस्तुत एक रिपोर्ट कहती है कि ”इससे ज्यादा कुछ आश्यर्चजनक नहीं हो सकता कि जो लोग परोपकारी उद्देश्यों से सक्रिय थे। वे भी व्यवहारतया तिरस्कार के लक्ष्य बन रहे थे।” सुंडरलैण्ड रिपोर्ट करते हैं कि ब्रिटिश हिन्दुओं को भारत में अजनबी और विदेशियों के रुप में इस ढंग से मानकर व्यवहार करते थे जैसे प्राचीन काल में जार्जिया और लुसियाना में अमेरिकी दासों के साथ ‘असहानुभूतिपूर्वक‘ कठोर और प्रताड़ित ढंग से किया जाता था।”
डुरंट ने कहा कि जिस विदेशी व्यवस्था के तहत भारत पर शासन चलाया जा रहा था, उसने भारतीयों को ‘कंगाली और निर्बलता‘ में सिमटा दिया।
डुरंट टिप्पणी करते हैं ”1783 की शुरुआत में एडमण्ड ब्रुके भविष्यवाणी करता है कि इंग्लैण्ड को भारतीय संसाधनों की वार्षिक निकासी बगैर बराबर की वापसी के वास्तव में भारत को नष्ट कर देगी। प्लासी से वाटरलू के सत्तावन वर्षों में भारत से इंग्लैण्ड को भेजी गई सम्पत्ति का हिसाब बु्रक एडमस् ने ढाई से पांच बिलियन डॉलर लगाया था। इससे काफी पहले मैकाले ने सुझाया था कि भारत से चुरा कर इंग्लैण्ड भेजी गई दौलत मशीनी आविष्कारों के विकास हेतु मुख्य पूंजी के रुप में उपयोग हुई और इसी के चलते औद्योगिक क्रांति संभव हो सकी।”
विल डुरंट ने अपनी पुस्तक ”दि केस फॉर इण्डिया” सन् 1930 में लिखी। जब कुछ समय बाद यह रवीन्द्रनाथ टैगोर के ध्यान में आई तो उन्होंने मार्च, 1931 के मॉडर्न रिव्यू में एक लेख लिखकर विल डुरंट को गर्मजोशी भरी बधाई दी, और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा ”जब मैंने विल डुरंट की पुस्तक में उन लोगों के बारे में जो उनके सगे सम्बन्धी नहीं थे, के दर्द और पीड़ा के बारे में मर्मस्पर्शी नोट देखा तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। मैं जानता हूं कि लेखक की अपने पाठकों से लोकप्रियता पाने का एक छोटा मौका मिलेगा और उनकी पुस्तक को हमारे लिए निषिध्द करने का जोखिम बना रहेगा, विशेषकर उन लोगों के विरुध्द अस्वाभाविक निन्दा करने की धृष्टता के बगैर भी अपने दुर्भाग्य से प्रताड़ित हो रहे हैं। लेकिन मैं निश्चिंत हूं कि उनके पास पश्चिम में स्वतंत्रता और निष्पक्षता की पैरोकारी की बेहतरीन व्यवस्था का परचम उठाए रखने के रुप में अनुपम पारितोषिक मिलेगा।” पश्च्यलेख (टेलपीस) विलियम डुरंट और एरियल डुरंट विद्वता के साथ-साथ प्रेम कहानी में भी सहभागी थे। अक्टूबर, 1981 में विलियम बीमार पड़े और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उनके अस्पताल में भर्ती होने के बाद से एरियल ने खाना त्याग दिया। 25 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई। जब विलियम को एरियल की मृत्यु के बारे में ज्ञात हुआ तो वह 7 नवम्बर को चल बसे।
भूपेंद्र सिंह चौहान
MATI KA DIYA
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माटी का दिया
मै हूँ माटी का दिया , काली रात का पीया .
मुझे जिसने जलाया मै वहा जल दिया
जल दिया जल दिया जल दिया जल दिया
मै तो झोपड़ी और महलों में रोशन किया
अँधेरा हर लिया और उजाला ही दिया
मैंने राजमहलो का सुख भी लिया मै हूँ माटी का दिया
पूजा पाठो में मैंने सब का साथ दिया
बिगड़ते काम को संभव किया
बिना दिया के भगवान् की पूजा किसने किया
मै हूँ माटी का दिया
घर महल से निकलकर शमशानों का सफ़र किया
मुझे जहां भी जलाया रौशन किया
मै हूँ माटी का दिया,काली रात का पीया .
मुझे जहां जलाया मै वहा चल दिया
चल दिया चल दिया चल दिया चल दिया
सब के सुख और दुःख में साथ दिया
मुझे जिसने बुलाया मई वहा चल दिया
इस अँधेरे को मैंने आँख दिया
मैंने तेल पिया और उजाला दिया मै हूँ माटी का दिया
जैसे सूरज ने जग को सबेरा दिया
मैंने जल जल करके उजाला किया
मैंने अँधेरा पिया और रौशन दिया
मै जल जल करके सबको ज्ञान दिया
मै हूँ माटी का दिया
श्री धनेश राम पटेल शिक्षक
राजनांदगांव
FIRST LAW CONSTITUTED BY BRITISH FOR INDIAN PUBLIC
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24.11.2012
भारत को लूटने एवं गुलाम बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने बनाए अनेक कानून
एक अंग्रेज अफसर ट्रेवेलियन ने अंग्रेजों को आगाह कर दिया था कि अंग्रेजी शिक्षा से वंचित भारतवासियों के दिलों में प्राचीन गौरवपूर्ण भारत के समाप्त हो जाने और अपनी पराधीनता के विरूध गहरा असंतोष भीतर ही भीतर भडकता रहता हैं। जिसका हमारे शासको को पता तक नही हैं। यह स्थिति अंग्रेजों के लिए बेहद खतरनाक थी ट्रेवेलियन की आशंकाए बहुत शीघ्र सच्ची साबित हुई उस के कुछ बर्ष बाद ही 1857 की क्रांति ने एक बार इस देश के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य को जडों तक बुरी तरह हिला कर रख दिया था
भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वह अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था | लेकिन नवम्बर 1857 में अंग्रेजों की एक वडी सेना भारत पहुची जिसने उस क्रांति को कुचलने का काम शुरू किया अंग्रेजों की विशाल सेना के भय एवं लालच के कारण कुछ गद्धारो ने अंग्रेजों को इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर तरह से योगदान दिया| धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया | और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि उन्हि गद्धारो के वशंज आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं | अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के नजदीक है
पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो या मरणासन्न | उसके बाद उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए जरूरी होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना शुरू किया | अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना शुरू किया था और मोटे तौर पर उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था, लेकिन 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए जरूरी होता है | आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं |
1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" | अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 50% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 50 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 20% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 20 रुपया CST दो | फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 7% मतलब 100 रुपया कमाया तो 7 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे ग्रामीण एव कुटिर उधोग (कारखाने )बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे शुद्र (करीगर ) बेरोजगार हो गए | इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है |1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने भारत के ही कुछ गद्दार के सहयोग से अपनी खोयी सत्ता को पुनर्स्थापित किया और 1 नवम्बर 1858 को भारत में प्रकाशित होने वाले कुछ अंग्रेजी अख़बारों में ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी का ये पत्र छपा जिसमे कहा गया था "आज से भारत में कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी
की सरकार नहीं बल्कि कानून की सरकार की स्थापना होगी"| लेकिन वो कानून कौन बनाएगा ? वो कानून अंग्रेजों की संसद बनाएगी, ब्रिटिश पार्लियामेंट बनाएगी और उसके हिसाब से भारत को चलाया जायेगा | अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में बहस इस बात को लेकर हुई कि "कानून ऐसे बनाये जाने चाहिए कि भारतवासी कभी भी दुबारा खड़े न हो सकें और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सकें" | इस तरह अंग्रेजों ने हमारे देश में कानून की सरकार बनाई और हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है .
पहला कानून
( 1 )*. Licensing of Arms Act -
सबसे पहला कानून ? आपको ये जानकार हैरानी होगी अंग्रेजों के खिलाफ जो बगावत हुई थी वो सशस्त्र बगावत थी, उसमे हथियारों का इस्तेमाल हुआ था तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून यही बनाया कि "हथियार वही रख सकेगा जिसके पास लाइसेंस होगा, लाइसेंस जिसके पास नहीं होगा वो हथियार रखने का अधिकारी नहीं होगा", तो अंग्रेजों ने क्या किया ? लाइसेंसिंग ऑफ़ आर्म्स एक्ट नामक पहला कानून बनाया और इस कानून के आधार पर क्या किया गया कि घर-घर की तलाशी ली गयी कि किसके घर में बन्दूक है, किसके घर में चाकू है, किसके घर में छुरा है, किसके घर में हसिया है और वो सब अंग्रेजों ने छीन लिया क्योंकि अंग्रेजों को डर था कि इन्ही हथियारों की मदद से भारतवासी फिर से बगावत कर सकते हैं | और इस कानून के आधार पर जब भारतवासियों के हर्थियर छीन लिए गए तब भारतवासी कमजोर हो गए और वो कमजोरी इतनी भारी पड़ी कि अगले 90 साल तक फिर अंग्रेजों की गुलामी हमको सहन करनी पड़ी | और इस देश का दुर्भाग्य ये कि ये कानून आज भी चल रहा है इस देश में | आपको मालूम है कि इस देश में हथियार वही रख सकता है जिसके पास लाइसेंस होगा और हथियार देने का काम पहले गोरे अंग्रेज करते थे आज लाइसेंस देने का काम काले अंग्रेज कर रहे हैं
2 दूसरा कानून
शिक्षा
भारत को गुलाम बनाने वाली शिक्षा 1857 की क्रान्ति के बाद जब 1860 में भारत के शासन को ईस्ट इण्डिया कम्पनी से छीनकर महारानी विक्टोरिया के अधीन किया लोग इसे मैकाले की शिक्षा प्रणाली के नाम से पुकारते हैं। लार्ड मैकाले ब्रिटिश पार्लियामेन्ट के ऊपरी सदन (हाउस आफ लार्ड्स
का सदस्य बनाया गया तब मैकाले को भारत में अंग्रेजों के शासन को मजबूत बनाने के लिये आवश्यक नीतियां सुझाने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया था। उसने सारे देश का भ्रमण किया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यहां झाडू देने वाला, चमड़ा उतारने वाला, करघा चलाने वाला, कृषक, व्यापारी (वैश्य;), मंत्र पढ़ने वाला आदि सभी वर्ण के लोग अपने-अपने कर्म को बड़ी श्रद्धा से हंसते-गाते कर रहे थे। सारा समाज संबंधों की डोर से बंधा हुआ था। शूद्र भी समाज में किसी का भाई, चाचा या दादा था एवं ब्राहमण भी ऐसे ही रिश्तों से बंधा था। बेटी गांव की हुआ करती थी तथा दामाद, मामा आदि रिश्ते गांव के हुआ करते थे। इस प्रकार भारतीय समाज भिन्नता के बीच भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ था। इस समय धार्मिक सम्प्रदायों के बीच भी सौहार्दपूर्ण संबंध था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुसलमान दोनों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया था। मैकाले को लगा कि जब तक हिन्दू-मुसलमानों के बीच वैमनस्यता नहीं होगी तथा वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत संचालित समाज की एकता नहीं टूटेगी तब तक भारत पर अंग्रेजों का शासन मजबूत नहीं होगा।
भारतीय समाज की एकता को नष्ट करने तथा वर्णाश्रित कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए मैकाले ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बनाया। अंग्रेजों की इस शिक्षा नीति का लक्ष्य था - संस्कृत, फारसी तथा लोक भाषाओं के वर्चस्व को तोड़कर अंग्रेजी का वर्चस्व कायम करना। साथ ही सरकार चलाने के लिए देशी अंग्रेजों को तैयार करना। इस प्रणाली के जरिए वंशानुगत कर्म के प्रति घृणा पैदा करने और परस्पर विद्वेष फैलाने की कोशिश की गई । इसके अलावा पश्चिमी सभ्यता एवं जीवन पद्धति के प्रति आकर्षण पैदा करना भी मैकाले का लक्ष्य था। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में ईसाई मिशनरियों ने भी महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई। ईसाई मिशनरियों ने ही सर्वप्रथम मैकाले की शिक्षा-नीति को लागू किया।अंग्रेजों के द्धारा बनाया गया तीसरा कानून
3 तीसरा कानून
Indian Police Act -
10 मई 1857 को जब देश में क्रांति हो गई और भारतवासियों ने पूरे देश में 3 लाख अंग्रेजो को मार डाला ।लेकिन कुछ गद्दार की वजह से अंग्रेज दुबारा भारत में वापस आयें और फ़ैसला किया कि अब हम भारतवासियों को सीधे मारे पीटेंगे नहीं,बल्कि कानून बना कर गुलाम रखेंगे । भारतवासी कभी भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सके इसके लिए भारतवासियों को दबाने-कुचलने के लिए एक ऐसा तंत्र चाहिए जो ये काम बखूबी कर सके और पुलिस नाम की एक व्यवस्था खड़ी की | क्या आपको मालूम है कि 1858 के पहले इस देश में पुलिसनाम की कोई व्यस्था नहीं हुआ करती थी? भारत के किसी भी क्षत्रिय राजा ने पुलिस व्यवस्था नहीं रखी थी, सैनिक और सेना थी लेकिन पुलिस नहीं होती थी, क्योंकि पुलिस की जरूरत नहीं होती थी, अपने ही लोगों को मारना, पीटना और धमकाना ये कौन करता है ? सन 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह / क्रांति को दबाया जा सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए, उनको डर था कि 1857 जैसी क्रांति दुबारा न हो जाये, तब अंग्रेजो ने इंडियन पुलिस एक्ट बनाया, और पुलिस बनायी, उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | उसमे एक धारा बनाई गई right to offence की, मतलब पुलिस वाला आप पर जितनी मर्जी लाठियां मारे पर आप कुछ नहीं कर सकते और अगर आपने लाठी पकड़ने की कोशिश की तो आप पर मुकद्दमा चलेगा और इसी कानून के आधार पर सरकार अंदोलन करने वालो पर लाठियां बरसाया करती थी, फ़िर धारा 144 बनाई गई ताकि लोग इकठे न हो सके और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की |
जब साईमन कमीशन भारत आने वाला था तो क्रान्तिकारी लाला लाजपत राय जी उसका शांति से विरोध कर रहे थे । अंग्रेज पुलिस के एक अफ़सर सांडर्स ने उन पर लाठिया बरसानी शुरु कर दी । एक लाठी मारी, दो मारी, तीन, चार, पांच, करते करते 14 लाठिया मारी । नतीजा ये हुआ लाला जी के सर से खून बहने लगा, उनको अस्तपताल ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गई । अब सांडर्स को सज़ा मिलनी चाहिए, इसके लिये शहीदेआजम भगत सिंह ने अदालत में मुकदमा कर दिया, सुनवाई हुई और अदालत ने फैसला दिया कि लाला जी पर जो लाठिया मारी गई है वो कानून के आधार पर मारी गई है अब इसमे उनकी मौत हो गई तो हम क्या करे इसमे कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि सांडर्स अपनी ड्यूटी कर रहा था, नतीजा सांडर्स को बाइज्जत बरी किया जाता है ।
तब भगत सिंह को गुस्सा आया उसने कहा जिस अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने लाला जी के हत्यारे को बाईज्जत बरी कर दिया, उसको सज़ा मैं दुंगा और इसे वहीं पहुँचाउगा जहाँ इसने लाला जीको पहुँचाया है और जैसा आप सब जानते हैं कि फ़िरभगत सिंह ने सांडर्स को गोली से उड़ा दिया और भगत सिंह को इसके लिये फ़ांसी की सज़ा हुई । जिंदगी के अंतिम दिनो में जब भगत सिंह लाहौर जेल में बंद थे तो बहुत से पत्रकार उनसे मिलने जाया करते थे और उसी बातचीत में किसी पत्रकार ने भगत सिंह से उनकी आख़िरी इच्छा पूछी । शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा कि " मैं देश के नौजवानो से उम्मीद करता हूँ कि जिस इंडियन पुलिस एक्ट के कारण लाला जी की जान गई, जिस इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर मैं फ़ांसी चढ़ रहा हूँ, इस देश के नौजवान आजादी मिलने से पहले पहले इसको खत्म करवा देगें, यही मेरे दिल की इच्छा है ।"
लेकिन ये बहुत शर्म की बात है कि आजादी के 65 साल के बाद आज भी इस कानून को हम खत्म नहीं करवा पाये । आज भी आप देखिये कि उसी इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर पुलिस देशवासियो पर कितना जूल्म करती है । कभी आन्दोलन करने वाले किसानों को डंडे मारती है, कभी औरत को डंडे मारती है और सैकड़ों लोग उसमे घायल होते हैं । हम हर साल 23 मार्च को भगत सिंह का शहीदी दिवस मानाते हैं । लाला लाजपत राय का शहीदी दिवस मानाते हैं । किस मुँह से हम उनको श्रद्धांजलि अर्पित करे कि"लाला लाजपत राय जी जिस कानून के आधार आपको लाठिया मारी गई और आपकी मौत हुई उस कानून को आजादी के 65 साल बाद भी हम खत्म नहीं करवा पाये, किस मुँह से हम भगत सिंह को श्रद्धांजलि दे कि भगत सिंह जी जिस अंग्रेजी कानून के आधार पर आपको फì
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24.11.2012
भारत को लूटने एवं गुलाम बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने बनाए अनेक कानून
एक अंग्रेज अफसर ट्रेवेलियन ने अंग्रेजों को आगाह कर दिया था कि अंग्रेजी शिक्षा से वंचित भारतवासियों के दिलों में प्राचीन गौरवपूर्ण भारत के समाप्त हो जाने और अपनी पराधीनता के विरूध गहरा असंतोष भीतर ही भीतर भडकता रहता हैं। जिसका हमारे शासको को पता तक नही हैं। यह स्थिति अंग्रेजों के लिए बेहद खतरनाक थी ट्रेवेलियन की आशंकाए बहुत शीघ्र सच्ची साबित हुई उस के कुछ बर्ष बाद ही 1857 की क्रांति ने एक बार इस देश के अंदर ब्रिटिश साम्राज्य को जडों तक बुरी तरह हिला कर रख दिया था
भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वह अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था | लेकिन नवम्बर 1857 में अंग्रेजों की एक वडी सेना भारत पहुची जिसने उस क्रांति को कुचलने का काम शुरू किया अंग्रेजों की विशाल सेना के भय एवं लालच के कारण कुछ गद्धारो ने अंग्रेजों को इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर तरह से योगदान दिया| धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया | और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि उन्हि गद्धारो के वशंज आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं | अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के नजदीक है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो या मरणासन्न | उसके बाद उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए जरूरी होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना शुरू किया | अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना शुरू किया था और मोटे तौर पर उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था, लेकिन 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए जरूरी होता है | आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं |
1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" | अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 50% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 50 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 20% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 20 रुपया CST दो | फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 7% मतलब 100 रुपया कमाया तो 7 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे ग्रामीण एव कुटिर उधोग (कारखाने )बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे शुद्र (करीगर ) बेरोजगार हो गए | इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है |1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने भारत के ही कुछ गद्दार के सहयोग से अपनी खोयी सत्ता को पुनर्स्थापित किया और 1 नवम्बर 1858 को भारत में प्रकाशित होने वाले कुछ अंग्रेजी अख़बारों में ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी का ये पत्र छपा जिसमे कहा गया था "आज से भारत में कंपनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) की सरकार नहीं बल्कि कानून की सरकार की स्थापना होगी"| लेकिन वो कानून कौन बनाएगा ? वो कानून अंग्रेजों की संसद बनाएगी, ब्रिटिश पार्लियामेंट बनाएगी और उसके हिसाब से भारत को चलाया जायेगा | अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में बहस इस बात को लेकर हुई कि "कानून ऐसे बनाये जाने चाहिए कि भारतवासी कभी भी दुबारा खड़े न हो सकें और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सकें" | इस तरह अंग्रेजों ने हमारे देश में कानून की सरकार बनाई और हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है .
बनाया गया सबसे पहला कानून
( 1 )*. Licensing of Arms Act - सबसे पहला कानून ? आपको ये जानकार हैरानी होगी अंग्रेजों के खिलाफ जो बगावत हुई थी वो सशस्त्र बगावत थी, उसमे हथियारों का इस्तेमाल हुआ था तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून यही बनाया कि "हथियार वही रख सकेगा जिसके पास लाइसेंस होगा, लाइसेंस जिसके पास नहीं होगा वो हथियार रखने का अधिकारी नहीं होगा", तो अंग्रेजों ने क्या किया ? लाइसेंसिंग ऑफ़ आर्म्स एक्ट नामक पहला कानून बनाया और इस कानून के आधार पर क्या किया गया कि घर-घर की तलाशी ली गयी कि किसके घर में बन्दूक है, किसके घर में चाकू है, किसके घर में छुरा है, किसके घर में हसिया है और वो सब अंग्रेजों ने छीन लिया क्योंकि अंग्रेजों को डर था कि इन्ही हथियारों की मदद से भारतवासी फिर से बगावत कर सकते हैं | और इस कानून के आधार पर जब भारतवासियों के हर्थियर छीन लिए गए तब भारतवासी कमजोर हो गए और वो कमजोरी इतनी भारी पड़ी कि अगले 90 साल तक फिर अंग्रेजों की गुलामी हमको सहन करनी पड़ी | और इस देश का दुर्भाग्य ये कि ये कानून आज भी चल रहा है इस देश में | आपको मालूम है कि इस देश में हथियार वही रख सकता है जिसके पास लाइसेंस होगा और हथियार देने का काम पहले गोरे अंग्रेज करते थे आज लाइसेंस देने का काम काले अंग्रेज कर रहे हैं
2.भारत को गुलाम बनाने वाली शिक्षा 1857 की क्रान्ति के बाद जब 1860 में भारत के शासन को ईस्ट इण्डिया कम्पनी से छीनकर महारानी विक्टोरिया के अधीन किया लोग इसे मैकाले की शिक्षा प्रणाली के नाम से पुकारते हैं। लार्ड मैकाले ब्रिटिश पार्लियामेन्ट के ऊपरी सदन (हाउस आफ लार्ड्स) का सदस्य बनाया गया तब मैकाले को भारत में अंग्रेजों के शासन को मजबूत बनाने के लिये आवश्यक नीतियां सुझाने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया था। उसने सारे देश का भ्रमण किया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यहां झाडू देने वाला, चमड़ा उतारने वाला, करघा चलाने वाला, कृषक, व्यापारी (वैश्य), मंत्र पढ़ने वाला आदि सभी वर्ण के लोग अपने-अपने कर्म को बड़ी श्रद्धा से हंसते-गाते कर रहे थे। सारा समाज संबंधों की डोर से बंधा हुआ था। शूद्र भी समाज में किसी का भाई, चाचा या दादा था एवं ब्राहमण भी ऐसे ही रिश्तों से बंधा था। बेटी गांव की हुआ करती थी तथा दामाद, मामा आदि रिश्ते गांव के हुआ करते थे। इस प्रकार भारतीय समाज भिन्नता के बीच भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ था। इस समय धार्मिक सम्प्रदायों के बीच भी सौहार्दपूर्ण संबंध था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुसलमान दोनों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया था। मैकाले को लगा कि जब तक हिन्दू-मुसलमानों के बीच वैमनस्यता नहीं होगी तथा वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत संचालित समाज की एकता नहीं टूटेगी तब तक भारत पर अंग्रेजों का शासन मजबूत नहीं होगा।
भारतीय समाज की एकता को नष्ट करने तथा वर्णाश्रित कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए मैकाले ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बनाया। अंग्रेजों की इस शिक्षा नीति का लक्ष्य था - संस्कृत, फारसी तथा लोक भाषाओं के वर्चस्व को तोड़कर अंग्रेजी का वर्चस्व कायम करना। साथ ही सरकार चलाने के लिए देशी अंग्रेजों को तैयार करना। इस प्रणाली के जरिए वंशानुगत कर्म के प्रति घृणा पैदा करने और परस्पर विद्वेष फैलाने की कोशिश की गई । इसके अलावा पश्चिमी सभ्यता एवं जीवन पद्धति के प्रति आकर्षण पैदा करना भी मैकाले का लक्ष्य था। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में ईसाई मिशनरियों ने भी महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई। ईसाई मिशनरियों ने ही सर्वप्रथम मैकाले की शिक्षा-नीति को लागू किया।अंग्रेजों के द्धारा बनाया गया तीसरा कानून
(3) *. Indian Police Act - 10 मई 1857 को जब देश में क्रांति हो गई और भारतवासियों ने पूरे देश में 3 लाख अंग्रेजो को मार डाला ।लेकिन कुछ गद्दार की वजह से अंग्रेज दुबारा भारत में वापस आयें और फ़ैसला किया कि अब हम भारतवासियों को सीधे मारे पीटेंगे नहीं,बल्कि कानून बना कर गुलाम रखेंगे । भारतवासी कभी भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न कर सके इसके लिए भारतवासियों को दबाने-कुचलने के लिए एक ऐसा तंत्र चाहिए जो ये काम बखूबी कर सके और पुलिस नाम की एक व्यवस्था खड़ी की | क्या आपको मालूम है कि 1858 के पहले इस देश में पुलिसनाम की कोई व्यस्था नहीं हुआ करती थी? भारत के किसी भी क्षत्रिय राजा ने पुलिस व्यवस्था नहीं रखी थी, सैनिक और सेना थी लेकिन पुलिस नहीं होती थी, क्योंकि पुलिस की जरूरत नहीं होती थी, अपने ही लोगों को मारना, पीटना और धमकाना ये कौन करता है ? सन 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह / क्रांति को दबाया जा सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए, उनको डर था कि 1857 जैसी क्रांति दुबारा न हो जाये, तब अंग्रेजो ने इंडियन पुलिस एक्ट बनाया, और पुलिस बनायी, उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | उसमे एक धारा बनाई गई right to offence की, मतलब पुलिस वाला आप पर जितनी मर्जी लाठियां मारे पर आप कुछ नहीं कर सकते और अगर आपने लाठी पकड़ने की कोशिश की तो आप पर मुकद्दमा चलेगा और इसी कानून के आधार पर सरकार अंदोलन करने वालो पर लाठियां बरसाया करती थी, फ़िर धारा 144 बनाई गई ताकि लोग इकठे न हो सके और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की |
जब साईमन कमीशन भारत आने वाला था तो क्रान्तिकारी लाला लाजपत राय जी उसका शांति से विरोध कर रहे थे । अंग्रेज पुलिस के एक अफ़सर सांडर्स ने उन पर लाठिया बरसानी शुरु कर दी । एक लाठी मारी, दो मारी, तीन, चार, पांच, करते करते 14 लाठिया मारी । नतीजा ये हुआ लाला जी के सर से खून बहने लगा, उनको अस्तपताल ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गई । अब सांडर्स को सज़ा मिलनी चाहिए, इसके लिये शहीदेआजम भगत सिंह ने अदालत में मुकदमा कर दिया, सुनवाई हुई और अदालत ने फैसला दिया कि लाला जी पर जो लाठिया मारी गई है वो कानून के आधार पर मारी गई है अब इसमे उनकी मौत हो गई तो हम क्या करे इसमे कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि सांडर्स अपनी ड्यूटी कर रहा था, नतीजा सांडर्स को बाइज्जत बरी किया जाता है ।
तब भगत सिंह को गुस्सा आया उसने कहा जिस अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने लाला जी के हत्यारे को बाईज्जत बरी कर दिया, उसको सज़ा मैं दुंगा और इसे वहीं पहुँचाउगा जहाँ इसने लाला जीको पहुँचाया है और जैसा आप सब जानते हैं कि फ़िरभगत सिंह ने सांडर्स को गोली से उड़ा दिया और भगत सिंह को इसके लिये फ़ांसी की सज़ा हुई । जिंदगी के अंतिम दिनो में जब भगत सिंह लाहौर जेल में बंद थे तो बहुत से पत्रकार उनसे मिलने जाया करते थे और उसी बातचीत में किसी पत्रकार ने भगत सिंह से उनकी आख़िरी इच्छा पूछी । शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा कि " मैं देश के नौजवानो से उम्मीद करता हूँ कि जिस इंडियन पुलिस एक्ट के कारण लाला जी की जान गई, जिस इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर मैं फ़ांसी चढ़ रहा हूँ, इस देश के नौजवान आजादी मिलने से पहले पहले इसको खत्म करवा देगें, यही मेरे दिल की इच्छा है ।"
लेकिन ये बहुत शर्म की बात है कि आजादी के 65 साल के बाद आज भी इस कानून को हम खत्म नहीं करवा पाये । आज भी आप देखिये कि उसी इंडियन पुलिस एक्ट के आधार पर पुलिस देशवासियो पर कितना जूल्म करती है । कभी आन्दोलन करने वाले किसानों को डंडे मारती है, कभी औरत को डंडे मारती है और सैकड़ों लोग उसमे घायल होते हैं । हम हर साल 23 मार्च को भगत सिंह का शहीदी दिवस मानाते हैं । लाला लाजपत राय का शहीदी दिवस मानाते हैं । किस मुँह से हम उनको श्रद्धांजलि अर्पित करे कि"लाला लाजपत राय जी जिस कानून के आधार आपको लाठिया मारी गई और आपकी मौत हुई उस कानून को आजादी के 65 साल बाद भी हम खत्म नहीं करवा पाये, किस मुँह से हम भगत सिंह को श्रद्धांजलि दे कि भगत सिंह जी जिस अंग्रेजी कानून के आधार पर आपको फाँसी की सज़ा हुई, आजादी के 65 साल बाद भी हम उसको सिर पर ढो रहे हैं ।" आजादी के 65 साल बाद आज भी पुलिस आन्दोलन करने वाले भारतवासियो को वैसे ही डंडे मì
