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विचार वीथी - राजपूत क्षत्रिय महासभा का ब्लॉग.

कृपया यह ध्यान रखें कि यहां व्यक्त विचार इस ब्लॉग में लिखने वाले लेखकों के अपने विचार हैं . आवश्यक नहीं है कि, राजपूत क्षत्रीय महासभा की इन विचारों से सहमत ही  हो .. अपने विचार व्यक्त करते समय मर्यादा और शालीनता का ध्यान रखें और किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न करें .

 

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CHAITR NAVRATRI

Posted by bsbaghel on April 6, 2016 at 12:35 PM Comments comments (0)

चैत्र नवरात्र / वासन्ती नवरात्र

राम नवमी एक वर्ष में चार नवरात्र चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीने की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन के होते हैं। इनमें चैत्र और आश्विन नवरा‍त्रि ही मुख्य माने जाते हैं। इनमें भी देवी भक्त आश्विन नवरा‍त्रि का बहुत महत्व है। इनको यथाक्रम वासंती और शारदीय नवरात्र कहते हैं। चैत्र नवरात्र को वासन्ती नवरात्र भी कहा जाता है। चैत्र नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से होता है। चैत्र में आने वाले नवरात्र में अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का विशेष प्रावधान माना गया है। चैत्र नवरात्रि प्रभु राम के जन्मोत्सव से जुड़ी है। चैत्र नवरात्र मां की शक्तियों को जगाने का आह्वान है ताकि हम संकटों, रोगों, दुश्मनों, आपदाओं का सामना कर सकें और उनसे हमारा बचाव हो सके।

MANGAL PANDEY

Posted by bsbaghel on April 8, 2015 at 12:20 PM Comments comments (0)

मंगल पांडे

इतिहास के आइने में

1857 की क्रांती के प्रणेता प्रथम शहिद मंगल पाण्डेय

कहा जाता है कि पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था परन्तु 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे के विद्रोह से उठी ज्वाला वक्त का इन्तजार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज हो गया. मंगल पाण्डे को 1857 की क्रान्ति का पहला शहीद सिपाही माना जाता है.

मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई 1827 को तत्कालीन गाजीपुर जनपद के बलिया तहसील अंतर्गत नगवां गांव के टोला बंधुचक में सुदिष्ट पाण्डेय व जानकी देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। वे तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के 19 वीं नेटिव इंफेंटरी रेजीमेंट के सिपाही थे। 1857 में भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में विद्रोह शुरू करने का श्रेय बलिया के नगवा गांव निवासी मंगल पाण्डेय को ही है। कारतूस में गाय व सूअर की चर्बी को लेकर 29 मार्च 1857 को मंगल पाण्डेय का क्रोध भड़क उठा।

29 मार्च 1857, दिन रविवार जनरल जान हियर्से अपने बंगले में आराम कर रहा था कि एक लेफ़्टिनेन्ट बदहवास सा दौडता हुआ आया और बोला कि देसी लाईन में दंगा हो गया है. खून से रंगे अपने घायल लेफ़्टिनेन्ट की हालत देखकर जनरल जान हियर्से अपने दोनों बेटों को लेकर 34वीं देसी पैदल सेना की रेजीमेन्ट के परेड ग्राऊंड की और दौडा. उधर धोती-जैकट पहने 34वीं देसी पैदल सैना का जवान मंगल पाण्डे नंगे पांव ही एक भरी बन्दूक लेकर कवाटर गार्ड के सामने बडे ताव में चहल कदमी कर रहा था और रह-रह कर अपने साथियों को ललकार रहा था - "अरे ! अब कब बंदूक निकलोगे ? तुम लोग अभी तक तैयार क्यों नहीं हो रहे हो ? ये अंग्रेज हमारा धर्म भ्रष्ट कर देंगे. तुम सब मेरे पीछे आओ. हम इन्हें अभी खत्म कर देते हैं." लेकिन अफ़सोस किसी ने उसका साथ नहीं दिया. परन्तु मंगल पाण्डे ने हार नहीं मानी और अकेले ही अंग्रेजी हुकूमत को ललकारता रहा. तभी अंग्रेज सार्जेंट मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन ने मंगल पाण्डे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया. यह सुन मंगल माण्डे का खून खौल उठा और उसकी बन्दूक गरज उठी. सार्जेट मेजर ह्यूसन वहीं लुढक गया. अपने साथी की यह स्थिति देख घोडे पर सवार लेफ़टिनेन्ट एडजुटेंट बेम्पडे हेनरी वाग मंगल पाण्डे की तरफ़ बढा , परन्तु इससे पहले कि वह उसे काबू कर पाता मंगल पाण्डे ने उस पर गोली चला दी. दुर्भाग्य से गोली घोडे को लगी और वाग नीचे गिरते हुये फ़ुर्ती से उठ खडा हुआ. अब दोनो आमने-सामने थे. इस बीच मंगल पाण्डे ने अपनी तलवार निकाल ली और पलक झपकते ही वाग के सीन और कंधे को चीरते हुये निकल गई. तब तक जनरल जान हियर्से ने जमादार ईश्वरी प्रसाद को हुक्म दिया कि मंगल पाण्डे को तुरन्त गिरफ़्तार कर लो पर उसने ऐसा करने से मना कर दिया. तब जनरल हियर्से ने भोख पल्टू को मंगल पाण्डे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया. भोख पल्टू ने मंगल पाण्डे को पीछे से पकड लिया. स्थिति भयावह हो चली थी. मंगल पाण्डे ने गिरफ़्तार होने से बेहतर मौत को गले लगाना उचित समझा और बंदूक की नाली अपने सीने पर रख पैर के अंगूठे से फ़ायर कर दिया. लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, सो मंगल पाण्डे सिर्फ़ घायल होकर ही रह गया. तुरन्त अंग्रेजी सेना ने उसे चारों तरफ़ से घेर कर बन्दी बना लिया और मंगल पाण्डे के कोर्टमार्शल का आदेश हुआ. अंग्रेजी हुकूमत ने 6 अप्रेल को फ़ैसला सुनाया कि मंगल पाण्डे को 18 अप्रेल को फ़ांसी पर चढा दिया जाये. परन्तु बाद में यह तारीख 8 अप्रेल कर दी गई ताकि विद्रोह की आग अन्य रेजिमेन्टों में भी न फ़ैल जाये. मंगल पाण्डे के प्रति लोगों में इतना सम्मान पैदा हो गया था कि बैरकपुर का कोई जल्लाद फ़ांसी देने को तैयार नहीं हुआ. नजीतन कलकता से चार जल्लाद बुलाकर मंगल पाण्डे को 8 अप्रेल, 1857 के दिन फ़ांसी पर चढा दिया गया. मंगल पाण्डे को फ़ांसी पर चढाकर अंग्रेजी हुकूमत ने जिस विद्रोह की चिंगारी को खत्म करना चाहा, वह तो फ़ैल ही चुकी थी और देखते ही देखते इसने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया.

14 मई 1857 को गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंगज ने मंगल पाण्डे का फ़ांसी नामा अपने आधिपत्य में ले लिया. 8 अप्रेल, 1857 को बैरकपुर, बंगाल में मंगल पाण्डे को प्राण दण्ड दिये जाने के ठीक सवा महीने बाद, जहां से उसे कल्कत्ता के फ़ोर्ट विलियम कालेज में स्थानान्तरित कर दिया गया था. सन 1905 के बाद जब लार्ड कर्जन ने उडीसा, बंगाल, बिहार और मध्य प्रदेश की थल सेनाओं का मुख्यालय बनाया गया तो मंगल पाण्डे का फ़ांसीनामा जबलपुर स्थान्तरित कर दिया गया. जबलपुर के सेना आय्ध कोर के संग्राहलय में मंगल पाण्डे का फ़ांसीनाम आज भी सुरक्षित रखा है. इसका हिन्दी अनुवाद निम्नवत है :-

 

जनरल आर्डर्स वाय हिज एक्सीलेन्सी द कमान्डर इन चीफ़, हेड कवार्टर्स, शिमला - 18 अप्रेल 1857,

 

गत 18 मार्च 1857, बुधवार को फ़ोर्ट बिलियम्स में सम्पन्न कोर्ट मार्शल के वाद कोर्ट मार्शल समिति 6 अप्रेल 1857, सोमवार के दिन बैरकपुर में पुन: इकट्ठा हुई तथा पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेन्ट्री के 1446 नंबर के सिपाही मंगल पाण्डे के खिलाफ़ लगाये गये निम्न आरोपों पर विचार किया.

 

आरोप (1) बगावत : - 29 मार्च 1857 को बैरकपुर में परेड मैदान पर अपनी रेजीमेंट की कवार्टर्गाड के समक्ष तलवार और राईफ़ल से लैस होकर अपने साथियों को ऐसे शब्दों में ललकारा, जिससे वे उत्तेजित होकर उसका साथ दें तथा कानूनों का उल्लंघन करें.

आरोप (2) इसी अवसर पर पहला वार किया गया तथा हिंसा का सहारा लेते हुये अपने वरिष्ठ अधिकारियों, सार्जेंट-मेजर जेम्स थार्नटन ह्यूसन और लेफ़्टिनेंट-अडजुटेंट बेंम्पडे हेनरी वाग जो 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेन्ट्री के ही थे, पर अपनी राईफ़ल से कई गोलियां दागी तथा बाद में तलवार से कई वार किये.

निष्कर्ष :- अदालत पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को उक्त आरोपों का दोषी पाती है.

 

सजा: -अदालत पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को मृत्यु पर्यन्त फ़ांसी पर लटकाये रखने की सजा सुनाती है.

अनुमोदित एंव पुष्टिकृत

हस्ताक्षरित जे.बी. हर्से, मेजर जनरल कमाण्डिंग

प्रेजीडेन्सी डिवीजन बैरकपुर - 7 अप्रेल 1857.

 

टिप्पणी : पांचवी कंपनी की 34वीं रेजीमेंट नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही नं: 1446, मंगल पाण्डे को कल 8 अप्रेल को प्रात: साढे पांच बजे ब्रिगेड परेड पर समूची फ़ौजी टुकडी के समक्ष फ़ांसी पर लटकाया जायेगा.

 

हस्ताक्षरित जे.बी. हर्से, मेजर जनरल कमाण्डिंग

प्रेजीडेन्सी डिवीजन

इस आदेश को प्रत्येक फ़ौजी टुकडी की परेड के दौरान और खास तौर से बंगाल आर्मी के हर हिन्दुस्तानी सिपाही को पढकर सुनाया जाये.

वाय आर्डर आफ़ हिज एक्सीलेन्सी

द कमान्डर इन चीफ़

सी. वेस्टर, कर्नल.

यहीं से भड़की आजादी की आग ने अंत में देश को आजाद करके ही दम लिया।

स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद मंगल पांडेय के 158 वें शहादत दिवस

29 मार्च 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी में दो अग्रेज अधिकारियों को मारकर शहीद मंगल पांडेय ने जंगे आजादी की अलख जगाई थी। तब से लेकर अब तक इस दिन को क्रांति दिवस के रुप में मनाया जाता है।

‘जिन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए ब्रितानी हुकूमत का डटकर मुकाबला किया। जिन्होंने अपने परिवार की चिंता किए बगैर अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम सहे। जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपनी पहली शहादत दी।

आम तौर पर ये तो सभी जानते हैं कि आजादी की जंग में सेना में रहकर विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले बलिया जिले के नगवां गांव निवासी सुदिष्ट पाण्डेय के पुत्र अमर शहीद मंगल पाण्डेय अविवाहित थे। लेकिन उनके दो सगे भाई थे। बड़े भाई नरेंद्र पाण्डेय व छोटे भाई ललित पाण्डेय। ललित पाण्डेय के दो पुत्र क्रमश: महावीर पाण्डेय व महादेव पाण्डेय हुए। महावीर पाण्डेय के एकमात्र पुत्र थे बरमेश्वर पाण्डेय। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में मंगल पाण्डेय से प्रेरित बरमेश्वर भी आजीवन अविवाहित रहते हुए अपना जीवन देश के नाम उत्सर्ग कर दिया।बरमेश्वर पाण्डेय ने भी आजादी की जंग में सक्रिय योगदान निभाया था। तब के बलिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इन्हें अपना कप्तान चुन लिया था और वे आजीवन कप्तान साहब कहे जाते रहे। वे 1930 से 1942 तक सक्रिय रूप से अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। दर्जनों बार जेल गए और यातनाएं सही।अमर शहीद मंगल पाण्डेय ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही थे, न कि अंग्रेजी सेना के। जब मंगल पाण्डेय ने बगावत की थी, तब विक्टोरिया ने उसे अपने कब्जे में नहीं लिया था। मंगल पाण्डेय ने न सिर्फ देश की आजादी बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

बी एस बघेल

Hinduism Is Based On Science

Posted by bsbaghel on March 21, 2015 at 3:35 PM Comments comments (0)

सनातन हिंदू धर्म पूर्णतह: वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है

निम्नांकित 22 कारणो से हिंदू धर्म पर विश्वास कर माना जाता है .

Hinduism Is Based On Science

 

1 वृक्ष

लोग को सुबह नीम और बरगद के पेड़ की पूजा करने के लिए सलाह दी जाती है । इन पेड़ों के पास उपलब्ध हवा श्वांस (inhaling) एवं स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है ।

People are advised to worship Neem and Banyan tree in the morning. Inhaling the air near these trees, is good for health.

 

2 योग

आप तनाव दूर करने के लिए कोई विधि खोजने का प्रयास कर रहे हैं, हिंदू योगासन प्राणायाम सुलभ एवं सर्वोतम विधि है एक नाक से श्वांस लेकर दुसरे नाक से श्वास धीरे धीरे छोडे ( inhaling exhaling )

If you are trying to look ways for stress management, there can’t be anything other than Hindu Yoga aasan Pranayama (inhaling and exhaling air slowly using one of the nostrils).

 

3 प्रतिष्ठान

हिंदू मंदिर को पूर्ण वैज्ञानिक रूप से बनाया जाता है। मंदिर में जहां मूर्ति स्थापना की जाती है उस स्थान को गर्भगृह ( मूलस्थानम ' Moolasthanam ' )कहा जाता है । गर्भगृह मे पृथ्वी के चुंबकीय तरंग अधिकतम मात्रा मे ईकठ्ठा हो जाता है फ़लस्वरुप गर्भगृह मे पूजन करना सर्वोत्तम एवं लाभप्रद होता है

Hindu temples are built scientifically. The place where an idol is placed in the temple is called ‘Moolasthanam’. This ‘Moolasthanam’ is where earth’s magnetic waves are found to be maximum, thus benefitting the worshipper.

 

4 तुलसी

हर हिंदू घर के एक तुलसी का पौधा जरुर होता है। तुलसी या तुलसी पत्र का सेवन करने से हमारा रोगप्रतिरोधक प्रणाली मजबूत होता हैं। तुलसी पत्र H1N1 के रोग को रोकने में हमारे शरीर को मदद करता है।

Every Hindu household has a Tulsi plant. Tulsi or Basil leaves when consumed, keeps our immune system strong to help prevent the H1N1 disease.

 

5 मन्त्र

प्राचिन हिन्दु पद्धति से वैदिक मंत्रों का लय एवं स्वर मे उच्चरण या अभ्यास करने से हमारे शरीर के अनेक रोगो / विकारो को दुर करने मे सहायक होता है । खासकर रक्तचाप को नियंत्रित करने मे अत्यन्त उपयोगी है।

The rhythm of Vedic mantras, an ancient Hindu practice, when pronounced and heard are believed to cure so many disorders of the body like blood pressure.

 

6 तिलक

हिंदुओं मे स्नान करने बाद माथे में पवित्र राख ( भभूत ) त्रिपूंड तिलक लगाया जाता है , यह आपके सिर से अतिरिक्त पानी को बाहर निकाल देता है।

Hindus keep the holy ash in their forehead after taking a bath, this removes excess water from your head.

 

7 कुंकुम

हिन्दु महिला माथे पर कुमकुम / बिंदी लगाती है जो कि महिलाओ को सम्मोहित होने से बचाता है ।

Women keep kumkum bindi on their forehead that protects from being hypnotised.

 

8 हस्त ग्रास

हाथों से भोजन करना पश्चिम में हेय दृष्टि से देखा , लेकिन हाथों से भोजन करने पर शरीर, मन और आत्मा को जोड़ता है।

Eating with hands might be looked down upon in the west but it connects the body, mind and soul, when it comes to food.

 

9 पत्तल

हिंदू रीति-रिवाज मे एक पत्तल मे एक बार ही भोजन किया जाता है। यह पर्यावरण के अनुकुल है केला एवं पलाश के पत्तों का उपयोग सर्वोत्तम माना जाता है .साफ करने के लिए रासायनिक साबुन की आवश्यकता नहीं है और यह पर्यवरण को नुकसान पहुँचाये बिना त्याग किया जा सकता है

Hindu customs requires one to eat on a leaf plate. This is the most eco-friendly way as it does not require any chemical soap to clean it and it can be discarded without harming the environment.banana; palash leaves

 

10 कर्णछेदन

बच्चो का कान क्षेदना वास्तव में एक्यूपंक्चर उपचार का हिस्सा है। कान में छेद अस्थमा के इलाज करने में मदद करता है।

Piercing of baby’s ears is actually part of acupuncture treatment. The point where the ear is pierced helps in curing Asthma.

 

11 हल्दी

घर मे पूजा करने के पहले और बाद मे हल्दी मिश्रित पानी का छिडकाव किया जाता है । हल्दी मे जीवाणुरोधी , दर्दनिवारक एवं एंटीऑक्सिडेंट गुण होता है ।

Sprinkling turmeric mixed water around the house before prayers and after. Its known that turmeric has antioxidant, antibacterial and anti-inflammatory qualities.

 

12 गोबर

भारत मे घर , आंगन एवं दिवार को गाय के गोबर से लिपने की पुरानी एवं प्राचिन प्रथा है गाय का गोबर जैवविरोधी खनिजों से समृद्ध होता है जो अनेक रोगो एवं वायरस से बचाता है

The old practice of pasting cow dung on walls and outside their house prevents various diseases/viruses as this cow dung is anti-biotic and rich in minerals.

13 गोमूत्र

विभिन्न बिमारियो से बचाव के लिए गौमूत्र सेवन किया जाता है यह पित्त , कफ़ एवं वायु को संतुलित करता है तथा हृदय रोग एवं जहर को दुर कर समाप्त करता है

Hindus consider drinking cow urine to cure various illnesses. Apparently, it does balance bile, mucous and airs and a remover of heart diseases and effect of poison.

 

14 शिक्षा

कान पकड कर ऊठक - बैठक करने की सजा वास्तव मे दिमाग को आत्म केन्द्रित एवं तेज करता है । यह ब्यवहारिक समस्या , सीखने मे कठिनाई तथा एस्परगर सिंड्रोंम को दूर करने मे सहायक है

The age-old punishment of doing sit-ups while holding the ears actually makes the mind sharper and is helpful for those with Autism, Asperger’s Syndrome, learning difficulties and behavioural problems.

 

15  दिया / दिपक

मंदीर एवं घर मे घी अथवा तेल का दिपक जलाने से सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होता जिससे सोंचने - समझने की शक्ति बढता एवं परिपूर्ण होता है

Lighting ‘diyas’ or oil or ghee lamps in temples and house fills the surroundings with positivity and recharges your senses.

 

16 जनेऊ

जनेऊ या स्ट्रींग धारण करना एक्यूप्रेसर चिकित्सा का एक हिस्सा है यह कई बिमारियों से सुरक्षित रखता है .

Janeu, or the string on a Brahmin’s body, is also a part of Acupressure ‘Janeu' and keeps the wearer safe from several diseases.

 

17 तोरण

नीम , अशोक अथवा आम के पत्तो का तोरण बनाकर घर के मुख्य द्वार मे लगाने से यह वातावरण को शुद्ध करता है

Decorating the main door with ‘Toran’- a string of mangoes leaves;neem leaves;ashoka leaves actually purifies the atmosphere.

 

18 चरणस्पर्श

अपने से बडो का झूककर चरण स्पर्श करने से रीढ की हड्डी सही स्थिति मे रह्ती है

Touching your elder’s feet keeps your backbone in good shape.

 

19 चिताग्नि

अग्निसंस्कार से मृत शरीर का साफ़ एवं उत्तम ढंग से अंतिम निपटान होता है .

Cremation or burning the dead, is one of the cleanest form of disposing off the dead body.

 

20  ॐ

ॐ मंत्र का जाप करने से हृदय का धडकन नियंत्रित होकर हृदय को आराम पहुंचाता है .तनाव दूर होता है एवं सतर्कता बढ जाती है

Chanting the mantra ‘Om’ leads to significant reduction in heart rate which leads to a deep form of relaxation with increased alertness.

 

21 हनुमान चालीसा

नासा के अनुसार ,हनुमान चालीसा , से सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी की सटीक गणना की गई है।

Hanuman Chalisa, according to NASA, has the exact calculation of the distance between Sun and the Earth.

 

22 शंख

शंख बजाने से एक विशेष प्रकार का ध्वनि तरंग उत्पन्न होता है जो अनेक हानिकरक किटाणुओ एवं किटो को समाप्त करता है । शंख बजाने से मच्क्षर का प्रजनन प्भावित होता है और मलेरिया उन्मूलन मे सहायक है

The ‘Shankh Dhwani’ creates the sound waves by which many harmful germs, insects are destroyed. The mosquito breeding is also affected by Shankh blowing and decreases the spread of malaria.

 

भागवत सिंह बघेल

 

PARASHU RAM

Posted by bsbaghel on March 14, 2015 at 12:35 PM Comments comments (0)

पं. परशुराम जी की कहानी

परशुराम जी ने मात्र 3 क्षत्रियों से लडाई मोल लिया था चार बार युद्ध किया था एक बार जीता था तीन बार हारा था

1. सम्राट सहस्त्रार्जुन हैहय वंश से पहला विरोध लिया था।

2. श्री राम

3. भीष्म पितामह

क्षात्र धर्म एवं ब्राम्हण धर्म दो मुख्य धर्म है पुरातन इतिहास मे प्रथम अंतरवर्ण विवाह क्षत्राणी रेणुका एवं ऋषि जमदग्नि ने किया थ। माता रेणुका ने जमदग्नि ऋषि के व्यक्तित्व में क्षत्रिय स्वरुप क्षात्र धर्म खोजना चाहा। एक क्षत्राणी अपने मन में उठने वाली हर भावना को अपने पति के सामने प्रकट कर देती है और करीब करीब सभी क्षत्रिय पति भी उनकी इन भावनाओ को अन्यथा नहीं लेते है और उन भावनाओ का उचित समाधान करते है .

जमदग्नि ऋषि रेणुका को अपने स्नान के लिए जल लाने के लिए कहा।रेणुका जी सरोवर में जल लेने गयी , वहां सरोवर में अश्वनी कुमार को अफ्सराओं के साथ स्नान करते हुए देखा।सरल स्वभाव रेणुका जी उन्हें देखती रही और मन में सोचने लगी कि यदि मैंने किसी क्षत्रिय विवाह किया होता तो मै भी इसी तरह राजसी सुख में होती । इसी सोच विचार मे उन्हें सरोवर से जल लाने मे काफी विलंब हुआ। जल लाने मे विलंब के कारण रेणूका से नाराज जमदग्नि अशांत बैठे थे ऱेणूका के आने पर जमदग्नि ने विलंब का कारण जानना चाहा तब रेणुका जी ने सब कुछ यों का त्यों जो उनके मन विचार आ रहा था बता दिया। इस घटना ने ऋषि जमदग्नि के मन मे रेणुका के प्रेम को शंका मे परिवर्तित कर दिया।

इस पर पंडितो ने कुछ ग्रंथो में लिखा है कि जमदग्नि ने उसी दिन से रेणुका का त्याग कर दिया था किन्तु इस विषय मे अनेक शोध के अनुसार जमदग्नि उस दिन से रेणुका पर बहुत शक करने लगे थे।

इस घटना के कुछ समय बाद सम्राट सहस्त्रार्जुन कहीं युद्ध मे जा रहे थे। इन्होने तत्कालीन ब्राह्मण रावण को अपनी अश्व शाला में बांध कर रख दिया था। रावण में 20 भुजाओं का बल था किन्तु सहस्त्रार्जुन में 1000 भुजाओं का बल था । सम्राट सहस्त्रार्जुन युद्ध मे विजय यात्रा से लौट रहे थे कि रास्ते में जमदग्नि के आश्रम में कुछ देर रुके , तब ऋषि जमदग्नि ने जल पान करने का अनुरोध किया इस पर सम्राट ने कहा मेरे साथ पूरी सेना है अतः मै अकेला जल पान कैसे करूँ

इसपर ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु गाय की मदद से पूरी सेना को भोजन एवं पकवान खिलाये । सम्राट सहस्त्रार्जुन ने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु का रहस्य मालूम होने पर उन्होंने कामधेनु को ऋषि जमदग्नि से उपहार स्वरूप माँगा किन्तु ऋषि ने नहीं दिया।

इस पर सम्राट सहस्त्रार्जुन ने जबरदस्ती कामधेनु को ले लिया ऋषि जमदग्नि ने श्राप का भय दिखाया परन्तु सम्राट सहस्त्रार्जुन ऋषि जमदग्नि से ज्यादा बड़े तपस्वी थे इसलिए ऋषि जमदग्नि का श्राप काम नहीं आया।

जब कामधेनु चली गयी तो ऋषि जमदग्नि ने आमरण अनशन प्रारंभ किया , इस घटना से रेणुका जी को बहुत क्रोध आया और वे सीधे सम्राट सहस्त्रार्जुन की राजधानी पहुंच गयी । वहां जाकर सम्राट सहस्त्रार्जुन को फटकार लगायी कि तुम कैसे क्षत्रिय हो जो एक ऋषि की म्रत्यु का कारण बन रहे हो सम्राट सहस्त्रार्जुन, रेणुका जी की वाणी से प्रभावित हुए और कामधेनु उन्हें सौंप कर अपनीकृत्य के लिए पश्चाताप कर क्षमा मांगी।

रेणुका कामधेनु को लेकर आश्रम पहुंची तब ऋषि जमदग्नि खुश नही हुए तथा लगे कि जो सम्राट मेरे श्राप से नहीं डरा वह रेणुका को कामधेनु कैसे वापस कर दिया। ऋषि जमदग्नि ने सोचा कि रेणुका ने सम्राट के साथ अपने सतीत्व को नष्ट किया होगा , उस दिन के बाद ऋषि जमदग्नि ने रेणुका को दण्डित करना चाहा किन्तु सफल नहीं हो पाया। ऋषि जमदग्नि बदले की ज्वाला से जलते हुए सहस्त्रार्जुन को दंड देने के लिए परशुराम को भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्राप्त किया।

ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र क्रमश: रुक्मवान, सुषेणु, वसु , विश्वावसु और परशुराम थे । महर्षि जमदग्नि ने उन सभी से बारी-बारी अपनी मां का वध करने को कहा लेकिन चार पुत्रो ने ऐसा नहीं किया। तब मुनि ने उन्हें श्राप दे दिया और उनकी विचार शक्ति नष्ट हो गई।

तब ऋषि जमदग्नि परशुराम को अपनी माता का वध करने का आदेश दिया कि वह अपनी माता रेणुका का सिर काट कर लाये । परशुराम सनातन काल मे विश्व का का पहला माँ का हत्यारा बन कर माँ रेणुका का शीश काट दिया। जब रेणुका की मौत और उनके साथ हुए अन्याय की खबर सम्राट सहस्त्रार्जुन को लगी कि रेणुका को इस लिए मार दिया गया क्योंकि उस पर आरोप है कि उसने राजा के साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाये थे इस पर क्रोधित राजा सहस्त्रार्जुन ने जमदग्नि और परशुराम पर आक्रमण कर दिया।परशुराम डर कर वन में जान बचाकर भाग गये किन्तु राजा ने दंड स्वरुप ऋषि जमदग्नि का सिर धड से अलग कर दिया।

इसके बाद परशुराम ने भारी तपस्या की और भगवान शंकर से फरशा शस्त्र प्राप्त किया और फिर सम्राट सहस्त्रार्जुन के ऊपर आक्रमण किया। इस बार भारी युद्ध के बाद परशुराम की विजय हुयी और फिर परशुराम अपनी हरकतों पर उतरे।परशू राम ने हैहय वंश के बच्चे बूढ़े गर्भवती महिलाओ तक की हत्या कर दी .सम्राट सहस्त्रार्जुन के पास 21 राज्य थे उन्हें हस्तगत कर लिया चाटुकार पंदितो ने उन 21 राज्यों को पहले 21 वंश और फिर बढ़ा कर 21 बार क्षत्रिय विहीन लिखना शुरू का दिया।

इस घटना के पश्चात परशुराम बहुत घमंडी हो गया किन्तु फिर भी विश्वामित्र और महाराज दशरथ और जनक जैसे क्षत्रियों के सामने आने से कतराते थे।

जब श्री राम ने शिव जी के धनुष को भंग कर दिया और परशुराम को पता चलने पर राजा जनक और विश्वामित्र जी जैसे क्षत्रियों के समक्ष आने का साहस नहीं कर पाया।जब श्री राम अयोध्या और मिथिला के मध्य मार्ग में थे और विश्वामित्र जी अपने आश्रम चले गए तब परशुराम श्री राम को डराने पहुंच गये ताकि भविष्य मे कोई क्षत्रिय उअनके सामने न आये ।

इस सोच के साथ परशुराम सीधा बिना अनुमति लिए अयोध्या के युवराज के रथ के पास पहुँच गया ।परशुराम ने देखा कि श्री राम ने उसनी ओर देखा तक नहीं इससे परशुराम चिढ गया और बोले "हे राम शिव के पुराने धनुष को तोड़ने से तुम्हे इतना घमंड कि मुझे पहचाना तक नहीं ? "श्री राम ने सहज भाव से कहा हां मैने तो आपको नहीं पहचाना किन्तु क्या आप मेरा वेश अर्थात अयोध्या का युवराज और ध्वजा दिखाई नहीं दे रही है ? परशुराम बोल मुझे प्रणाम तक नहीं किया । श्री राम बोले आपको तो अयोध्या के युवराज का आदर करना चाहिए । विवाद बढ़ता देख महाराज दशरथ जी आये और सोचा यह मुर्ख परशुराम केवल प्रणाम के लिए अनावश्यक उलझ रहा है ।

महाराज दशरथ जी बोले " हां ऋषिवर आपको मै पहचानता हूँ । किन्तु परशुराम ने महाराज दशरथ जी को जोर का धक्का मार दिया।

परिणाम्स्वरुप वही हुआ जो किसी क्षत्रिय के सामने उसके पिता के अपमान करने वाले का होता है।

श्री राम ने धनुष संभाला , परशुराम एक पिनाक धनुष को लिए फिरता था और परशुराम को वरदान था कि जो इस पिनाक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दे वह तेरा काल है उससे कैसे भी बचकर भाग जाना।परशुराम ने कहा इतना बडा योद्धा है राम तो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर बता।

श्री राम ने प्रत्यंचा ही नहीं बाण भी चढ़ा लिया और कहा " हे मुर्ख और घमंडी तपस्वी तूने मेरे पिता का अपमान किया है अब मै तेरी सारी तपस्या,21 राज्यों जिन्हें तूने सहस्त्रार्जुन से लिया था और तेरी मनोगति से विचरण क़ी क्षमता को इस एक ही बाण से समाप्त किये देता हूँ।

इस पर परशुराम महाराज दशरथ के पैरो में गिर गए और कहा कि अपने यशस्वी पुत्र से मुझे कम से कम केवल मनोगति से विचरण की क्षमता को छोड सब कुछ खत्म करने का अनुरोध किया ।

महाराज दशरथ जी के कहने पर श्री राम ने परशुराम की केवल एक बार मनोगति से विचरण की क्षमता छोड़ी बाकि 21 राज्य और सारी तपस्या का बल हर लिया।

तथा चेतवानी दी कि मेरे पूरे जीवन काल में दुबारा मत दिखाई देना वरना फिर माफ़ नहीं करूँगा।वहां से जान बचाकर परशुराम भागे और महेन्द्र पर्वत पर जाकर वहां जातिवादी स्कुल खोली जिसमे किसी गैर ब्राह्मण को शिक्षा नहीं दी जाती थी।परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता रेणुका जो क्षत्राणी थी की शिक्षाओं से सीख ली थीँ वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है। अपवाद स्वरुप केवल दो ब्यक्ति भीष्म एवं कर्ण को शिक्षा दिया था , परन्तु जैसे ही कर्ण क्षत्रिय है पता लगा श्राप देकर उस विद्या से कर्ण को विलग कर दिया था

भीष्म से पराजित होते सभी ने देखा होगा। इस महान परशुराम जी की यही कहानी है चार बार 3 क्षत्रियों से दुश्मनी मोल लिया 3 बार हारे एक बार जीते थे।

महर्षि बाल्मीकि जी की रामायण से पूरी वस्तविकता सामने है । तुलसी दास जी ने और उससे पहले कुछ पुराणों में परशुराम को जबरदस्ती लेखनी के बल पर महान बनाने का दुष्कृत्य किया जा रहा है।परशुराम शिव धनुष का रक्षक नहीं थे। होते तो शिव जी का वह धनुष मिथिला में नहीं होता।परशुराम को अपने तपोबल की श्रेष्टता सिद्ध करनी थी पर हुआ उसका उल्टा .

कुछ लोग कहते श्री कृष्ण ने भी परीक्षत को जीवन दान दिया उस सम्बन्ध में यह था कि श्री कृष्ण ने परीक्षित का उपचार किया था अश्वसथामा ने भी वही कायराना हरकत करके परीक्षित जी को मृत प्राय कर दिया था जिनका इलाज वासुदेव श्री कृष्ण ने स्पर्श विज्ञान द्वारा किया था।

 

बी एस बघेल

CHANDRA SHEKHAR AZAD

Posted by bsbaghel on February 27, 2015 at 3:00 AM Comments comments (0)

क्रांतिकारी वीर-सपूत चंद्रशेखर आजाद

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश के कई क्रांतिकारी वीर-सपूतों की याद आज भी हमारी रुह में जोश और देशप्रेम की एक लहर पैदा कर देती है. एक वह समय था जब लोग अपना सब कुछ छोड़कर देश को आजाद कराने के लिए बलिदान देने को तैयार रहते थे और एक आज का समय है जब अपने ही देश के नेता अपनी ही जनता को मार कर खाने पर तुले हैं. देशभक्ति की जो मिशाल हमारे देश के क्रांतिकारियों ने पैदा की थी अगर उसे आग की तरह फैलाया जाता तो संभव था आजादी हमें जल्दी मिल जाती.

 

वीरता और पराक्रम की कहानी हमारे देश के वीर क्रांतिकारियों ने रखी थी वह आजादी की लड़ाई की विशेष कड़ी थी जिसके बिना आजादी मिलना नामुमकिन था.

भारत का इतिहास गवाह है कि यहां कई महापुरुष हुए, जिन्‍होंने देश के लिये अपनी जान तक न्‍योछावर कर दी।उन्‍हीं में से एक हैं चंद्रशेखर आज़ाद, जिन्‍होंनेदेशप्रेम, वीरता और साहस की एक ऐसी ही मिशाल थे शहीद क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद. 25 साल की उम्र में भारत माता के लिए शहीद होने वाले इस महापुरुष के बारें में जितना कहा जाए उतना कम है. आज ही के दिन साल 1931 में चन्द्रशेखर आजाद शहीद हुए थे.भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम में राम प्रसाद बिसमिल और सरदार भगत सिंह के साथ अंग्रेजों की नींदें हराम कर दी थीं। पृथ्वी पर चन्द्रशेखर आजाद जैसे योद्धा का अवतरण एक चमत्कारिक सत्य है, जिससे बदरिकाश्रम के समान पवित्र उन्नाव जिले का बदरका गांव संसार में जाना जाता है. कानपुर जिसे हम क्रांति-राजधानी कह सकते है, के निकटवर्ती इसी जनपद में पं. सीताराम तिवारी के पुत्र के रूप में बालक चन्द्रशेखर जन्‍म 23 जुलाई 1906 को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में हुआ था। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी 1956 में अकाल पड़ने पर गांव छोड़ कर मध्‍य प्रदेश चले गये थे। चन्द्रशेखर का बाल्यकाल मध्य प्रदेश के मालवा में व्यतीत हुआ अंग्रेज शासित भारत में पले बढ़े आजाद की रगों में शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत भरी हुई थी। आजाद की एक खासियत थी न तो वे दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड ने उन्‍हें झकझोर कर रख दिया था। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। महात्‍मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन खत्‍म किये जाने पर सैंकड़ों छात्रों के साथ चन्द्रशेखर भी सड़कों पर उतर आये। छात्र आंदोलन के वक्‍त वो पहली बार गिरफ्तार हुए। तब उन्‍हें 15 दिन की सजा मिली। असहयोग आंदोलन से जागे देश में दमन-चक्र जारी था, सत्याग्रहियों के बीच निकल पड़े, प्रस्तरखंड उठाया, बेंत बरसाने वालों में से एक सिपाही के सिर में दे मारा. पेशी होने पर अपना नाम आजाद, काम आजादी के कारखाने में मजदूरी और निवास जेलखाने में बताया. गुस्साए अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने पंद्रह बेंतों की सख्त सजा सुनाई. हर सांस में वंदेमातरम का निनाद करते हुए उन्होंने यह परीक्षा भी उत्तीर्ण की । सन 1922 में गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। तभी वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। आज़ाद ने क्रांतिकारी बनने के बाद सबसे पहले 1 अगस्‍त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया। इसके बाद 1927 में बिसमिल के साथ मिलकर उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया। भगत सिंह व उनके साथियों ने लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला संडर्स को मार कर लिया। फिर दिल्‍ली असेम्बली में बम धमाका भी आजाद ने किया। आजाद का कांग्रेस से जब मोह भंग हो गया आजाद ने अपने संगठन के सदस्‍यों के साथ गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके। इस दौरान उन्‍होंने व उनके साथियों ने एक भी महिला या गरीब पर हाथ नहीं उठाया। डकैती के वक्‍त एक बार एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने उसूलों के चलते हाथ नहीं उठाया। उसके बाद से उनके संगठन ने सरकारी प्रतिष्‍ठानों को ही लूटने का फैसला किया। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी पर लटकाकर मार दिया। अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया. क्रांति की जितनी योजनाएं बनीं सभी के सूत्रधार आजाद थे. कानपुर में भगत सिंह से भेंट हुई. साथियों के अनुरोध पर आजाद एक रात घर गए और सुषुप्त मां एवं जागते पिता को प्रणाम कर कर्तव्यपथ पर वापस आ गए. सांडर्स का वध-विधान पूरा कर राजगुरु, भगतसिंह और आजाद फरार हो गए. 8 अप्रैल 1929 को श्रमिक विरोधी ट्रेड डिस्प्यूट बिल का परिणाम सभापति द्वारा खोलते ही, इसके लिए नियुक्त दर्शक-दीर्घा में खड़े दत्त और भगत सिंह को असेंबली में बम के धमाके के साथ इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते गिरफ्तार कर लिया गया. भगत सिंह को छुड़ाने की योजना चन्द्रशेखर ने बनाई, पर बम जांचते वोहरा सहसा शहीद हो गए. घर में रखा बम दूसरे दिन फट जाने से योजना विफल हो गई. हमारी आजादी की नींव में उन सूरमाओं का इतिहास अमर है जिन्होंने हमें स्वाभिमानपूर्वक अपने इतिहास और संस्कृति की संरक्षा की अविचल प्रेरणा प्रदान की है.एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी को छुड़ाने की योजना भी बनायी, लेकिन आजाद उसमें सफल नहीं हो पाये। 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी का

कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। सभी ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।" दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड के आरोपियों भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने पर भगत सिंह काफी आहत हुए। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। क्रांतीकारी चन्द्रशेखर नेमृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने के लिए सर्व प्रथम मोहन दास करम चंद गांधी से मिलने का प्रयास किया परन्तु गांधी जी द्वारा चंद्रशेखर को देश द्रोही करार देकर मिलने से इंकार करने एवं किसी भी प्रकार का सहयोग नही करने का संदेश देने पर निराश चंद्रशेखर 27 फरवरी 1931 को वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से मिले और आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने भुनभुनाते हुए बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मिले और इस बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि पंडित नेहरू की सूचना पर सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर भारी पुलिस बल के साथ जीप से वहाँ आ पहुंचा। चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया. चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे. अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपनी बंदूक में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही मार ली और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही आत्महत्या कर ली.अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया कहते हैं मौत के बाद अंग्रेज अफसर और पुलिस वाले चन्द्रशेखर आजाद की लाश के पास जाने से भी डर रहे थे. महान देश भक्त चंद्रशेखर आजाद शहीद हो भारत माता की गोद मे हमेशा के लिए सो गये । पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था।चंद्रशेखर आज़ाद को वेष बदलने में बहुत माहिर माना जाता था. वह रुसी क्रांतिकारियों की कहानी से बहुत प्रेरित थे. चन्द्रशेखर आजाद की वीरता की कहानियां कई हैं जो आज भी युवाओं में देशप्रेम की लहर पैदा कर देती हैं. देश को अपने इस सच्चे वीर स्वतंत्रता सेनानी पर हमेशा गर्व रहेगा.

बी एस बघेल

MAJOR DHYAN CHAND SINGH

Posted by bsbaghel on January 21, 2015 at 11:10 AM Comments comments (0)

                                                                                       भारत रत्न के सर्वोच्च एवं सबसे उपयुक्त

 

                                                                                 हाकी के जादूगर

 

                                                                              मेजर ध्यानचंद सिंह

 

मेजर ध्यानचंद सिंह का जन्म 29 अगस्त सन्‌ 1905 ई. को इलाहाबाद संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत में हुआ था एवं मृत्यु 3 दिसंबर, 1979 को हुआ। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी। साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में 1922 में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से सेना मे भरती हुए थे। जब 'प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट' में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी को है। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए।सन्‌ 1922 . से सन्‌ 1926 तक सेना की ही प्रतियोगिताओं में हाकी खेला करते थे। दिल्ली में हुई वार्षिक प्रतियोगिता में जब इन्हें सराहा गया तो इनका हौसला बढ़ा। 13 मई सन्‌ 1926 . को न्यूजीलैंड में पहला मैच खेला था। न्यूजीलैंड में 21 मैच खेले जिनमें 3 टेस्ट मैच भी थे। इन 21 मैचों में से 18 जीते, 2 मैच अनिर्णीत रहे और और एक में हारे। पूरे मैचों में इन्होंने 192 गोल बनाए। उनपर कुल 24 गोल ही हुए। 27 मई सन्‌ 1932 को श्रीलंका में दो मैच खेले। ए मैच में 21-0 तथा दूसरे में 10-0 से विजयी रहे। सन्‌ 1935 ई. में भारतीय हाकी दल के न्यूजीलैंड के दौरे पर इनके दल ने 49 मैच खेले। जिसमें 48 मैच जीते और एक वर्षा होने के कारण स्थगित हो गया। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए। अप्रैल, 1949 को प्रथम कोटि की हाकी से संन्यास ले लिया।

 

सन्‌ 1927 में लांस नायक बना दिए गए। सन्‌ 1932 में लॉस ऐंजल्स जाने पर नायक नियुक्त हुए। सन्‌ 1937 में जब भारतीय हाकी दल के कप्तान थे तो उन्हें सूबेदार बना दिया गया। जब द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हुआ तो सन्‌ 1943 में 'लेफ्टिनेंट' नियुक्त हुए और भारत के स्वतंत्र होने पर सन्‌ 1948 में कप्तान बना दिए गए। केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई। 1938 में उन्हें 'वायसराय का कमीशन' मिला और वे सूबेदार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।

 

उन्हें १९५६ में खेल के क्षेत्र मेंभारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।

 

उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

 

उन्हें भारत एवं विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाडियों में शुमार किया जाता है। वे तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं जिनमें 1928 का एम्सटर्डम ओलोम्पिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलोम्पिक एवं 1936 का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है। उनकी जन्म तिथि 29 अगस्त को भारत में "राष्ट्रीय खेल दिवस" मनाया जाता है |

 

मेजर ध्यानचंद सिंह ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना प्रशंसक बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंतर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त 2005 को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाया एवं 29 अगस्त2005 मेजर ध्यानचंद सिंह के जन्मशती को खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से सन 1935 मे जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी तब मिले थे । तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और मेजर ध्यानचंद सिंह दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।

 

ब्रैडमैन को जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का जबर्दस्त प्रशंसक बना दिया। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के सभी हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर एक ही नाम छाया रहता था और वह था ध्यानचंद। मेजर ध्यानचंद सिंह के स्टीक मे गेंद इस कदर से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। हॉकी मे उनकी कलाकारी देखकर हॉकी के प्रशंसक वाह-वाह कहते ही थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मदमस्त हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश की थी।

 

लेकिन मेजर ध्यानचंद सिंह ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।

 

1.वियना में मेजर ध्यानचंद सिंह की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई गी है और दिखाया गया है कि मेजर ध्यानचंद सिंह कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे।

 

2.भारत की स्वतंत्रता के पहले जब भारतीय हॉकी टीम विदेशी दौरे पर थी, भारत ने 3 ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते. और खेले गए 48 मेचो में से सभी 48 मेच भारत ने जीते.

 

3. भारत 20 वर्षो से हॉकी में अपराजेय था. हमने अमेरिका को खेले गए सभी मेचो में करारी मात दी इसी के चलते अमेरिका ने कुछ वर्षो तक भारत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था .

 

4. मेजर ध्यानचंद सिंह की प्रशंसको की सूची में हिटलर का नाम सबसे उपर आता है.

 

5.हिटलर ने मेजर ध्यानचंद सिंह को जर्मनी की नागरिकता लेने के लिए प्रार्थना की, साथ ही जर्मनी की ओर से खेलने के लिए आमंत्रित किया' उसके बदले उन्हें सेना का अध्यक्ष और बहुत सारा पैसा देने की बात कही. लेकिन जवाब में ध्यानचंद ने उन्हें कहा की मैं पैसो के लिए नहीं देश के लिए खेलता हूँ.

 

6. हिटलर मेजर ध्यानचंद सिंह के प्रशंसक कैसे बने ?

 

जब जर्मनी में हॉकी वर्ल्डकप चल रहा था.तब एक मैच के दौरान जर्मनी के गोल कीपर ने उन्हें घायल कर दिया. इसी बात का बदला लेने के लिए मेजर ध्यानचंद सिंह ने टीम के सभी खिलाडियों के साथ एक योजना बनायीं और

 

भारतीय टीम ने गोल तक पहुचने के बाद भी गोल नहीं किया और बॉल को वही छोड़ दिया. यह जर्मनी के लिए बहुत'बड़ी शर्म की बात थी.

 

7. एक मैच ऐसा था जिसमे मेजर ध्यानचंद सिंह एक भी गोल नहीं कर पा रहे थे .

 

इस बीच उन्होंने रेफरी से कहा "मुझे मैदान की लम्बाई कम लग रही है" जांच करने पर मेजर ध्यानचंद सिंह सही पाए गए और मैदान को ठीक किया गया. उसके बाद ध्यानचंद ने उसी मैच में 8 गोल दागे.

 

8. वे मेजर ध्यानचंद सिंह एक अकेले भारतीय थे जिन्होंने आजादी से पहले भारत में ही नहीं जर्मनी में भी भारतीय झंडे को फहराया.उस समय हम अंग्रेजो के गुलाम हुआ करते थे भारतीय ध्वज पर प्रतिबंद था. इसलिए उन्होंने ध्वज को अपनी नाईट ड्रेस में छुपाया और उसे जर्मनी ले गए. इस पर अंग्रेजी शासन के अनुसार उन्हें कारावास हो सकती थी लेकिन हिटलर ने ऐसा नहीं किया.

 

9. जीवन के अंतिम समय में उनके पास खाने के लिए पैसे नहीं थे.

 

इसी दौरान जर्मनी और अमेरिका ने उन्हें कोच का पद ऑफर किया लेकिन उन्होंने यह कहकर नकार दिया की "अगर मै उन्हें हॉकी खेलना सिखाता हूँ तो भारत और अधिक समय तक विश्व चैंपियन नहीं रहेगा."

 

लेकिन भारत की सरकार ने उन्हें किसी प्रकार की मदद नहीं की तदुपरांत भारतीय आर्मी ने उनकी मदद की.

 

एक बार ध्यानचंद अहमदाबाद में एक हॉकी मैच देखने गए. लेकिन उन्हें स्टेडियम में प्रवेश नहीं दिया गया स्टेडियम संचालको ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया . इसी मैच में जवाहरलाल नेहरु ने भी भाग लिया था.

 

10. आख़िरकार क्रिकेट के आदर्श सर डॉन ब्रेड मैन ने कहा "मै ध्यानचंद का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ मेरे रन बनाने से भी आसानी से वे गोल करते है,"

 

ऎसे भारत माता के सपूत जिन्होने केवल भारत के लिए हाकी खेला एवं भारत को अपना सब कुछ सौंप दिया क्या भारत रत्न का हकदार नही है ?

 

यह चोंकाने वाली बात है भारत की सरकार द्वारा उन्हें भारत रत्न नहीं मिला लेकिन लगभग 50 से भी अधिक देशो से उन्हें 400 से अधिक अवार्ड प्राप्त हुए.

 

नतमस्तक है हम ऐसे महान हस्ती मेजर ध्यानचंद सिंह के सामने जिन्होने भारत मे जन्म लिया था !!

 

!!! जय भारत , जय हिन्द !!!

LOHADI

Posted by bsbaghel on January 13, 2015 at 1:00 PM Comments comments (0)

"लोहड़ी"

 

"लोहड़ी" की शुभकामनाएं

लोहड़ी का सबंध कई ऐतिहासिक कहानियों के साथ जोड़ा जाता है. इस से जुड़ी प्रमुख लोककथा बहादुर राजपूत योद्धा "दुल्ला भट्टी" की है. अकबर के शासन काल में, अत्याचार चरमसीमा पर था, मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे. उस समय बहादुर राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाया एवं अकबर के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ किया .

उस समय दुल्ला भट्टी नाम के राजपूत योद्धा ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलो से छुडाकर, उनका हिन्दू लड़कों से व्याह कराया और खुद उनका भाई बनकर कन्यादान किया. "दुल्ला" एक भट्टी राजपूत वंश के बहादुर योद्धा थे. वो अत्याचारियों के दुश्मन और आम जनता के रक्षक थे. वह मुगलो के अत्याचार के खिलाफ़ थे जिस्के कारण मुग़ल शासक उनको डाकू बताते थे.

एक मशहूर कहानी है कि - एक ब्राह्मण की दो बेटियों थी "सुंदरी" और "मुंदरी". उनकी सगाई हो चुकी थी, लेकिन इलाके का मुगल जागीरदार उनसे जबरन शादी करना चाहता था. उस मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले भी डरकर पीछे हट गए थे. ब्राह्मण और उसकी बेटियों ने जहर खाकर आत्मह्त्या करने का निर्णय ले लिया था.

जब दुल्ला को पता चला तो उसने, लड़के वालों को राजीकर, एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का व्याह करवाया. दुल्ला ने भाई बनकर खुद ही दोनों का कन्यादान भी किया था. उसके बाद दुल्ला ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुक्त करवाकर उनकी इज्ज़त और जान की रक्षा की तथा उनका भाई बनकर, उनकी शादी हिन्दू लडको से करवाई.

लोहड़ी के गीतों में लडकिया / महिलाए अपने भाई को सम्मान से "दुल्ला" भाई के रुप मे याद करती हैं.

इस त्यौहार के साथ वीर राजपूत योद्धा "दुल्ला भट्टी" की घटना के सम्बन्ध के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. इस जानकारी के साथ, इस पर्व को पूरे हर्षोल्लाष के साथ मनाये और दान- धर्म का कार्य करते हुए जीवन को सफल बनाए.

बी एस बघेल



 


MAKAR SANKRANTI

Posted by bsbaghel on January 13, 2015 at 1:00 PM Comments comments (0)

"मकरसंक्रांति"

 

"मकर संक्रान्ति" भारत का बहुत ही लोकप्रिय त्योहार हैं और समस्त भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. पंजाब में मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर "लोहड़ी" का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन पूर्वोत्तर में "बिहू" का त्यौहार मनाते हैं तथा दक्षिण भारत में "पोंगल" के रूप में मनाते हैं.

इस दिन भगवान सुर्य देव "दक्षिणायण" से "उत्तरायण" में आ जाते हैं और सर्दी से कंपकपाती धरती को राहत मिलना प्रारम्भ हो जाती है. यह अवसर पूर्णतयः उत्साह उमंग का होता है. कहीं लोग आग जलाकर उसके चारों और नृत्य करते हैं, कहीं पतंग उड़ाते हैं, कहीं नौका दौड़ होती है. इस अवसर पर दान- पुन्य का बहुत महत्त्व माना गया है.

पंजाब में "लोहड़ी" की रात्रि में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं. इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाते हुए नाचते गाते हुए खुशियाँ मनाते हैं. सम्पूर्ण भारत में इसे "दान" के पर्व के रूप में मनाया जता हैं. ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिये गये दान का सौ गुना फल प्राप्त होता है.

आजकल पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित लोगों ने इस महापर्व को भी विकृत कर दिया है. कुछ लोग पवित्र अग्नि को, "कैंप फायर" समझकर उसके इर्द-गिर्द अश्लीलता से नाचते हुए मांस मदिरा का सेवन करते हैं. यह सर्वथा अनुचित है,

1. इस महापर्व से बहुत सारी कहानियां जुड़ी हुई हैं. सबसे प्राचीन कथा भगवान शिव की पत्नी "सती" के आत्मदाह से जुड़ी हुई हैं. "सती" के पिता "दक्ष" ने "कनखल" में एक यज्ञ का आयोजन किया था जिसकी पूर्णाहुति मकर संक्रांति के दिन निश्चित था . राजा दक्ष अपने दामाद "शिव" से नाराज होने के कारण उन्होंने यज्ञ में आने के लिए अपनी बेटी सती एवं दामाद शिव को निमंत्रित नहीं किया था .

भगवान शिव के मना करने के पश्चात भी "भगवती सती" ने पिता का तो घर है, मुझे निमंत्रण की क्या आवश्यकता. और वे बिना बुलाये ही अपने पिता के यज्ञ में चली गई, परन्तु बहां पिता के यज्ञ में दामाद "शिव" का भाग न होने से अपने पति का अपमान देखकर "सती" क्रोधित होकर योगाग्नि में भस्म हो गई. यह मकर संक्रांति की पूर्वसंध्या का समय था. इसीलिये "अग्नि" को "माता सती" मानकर पूजा जाता है.

"माता सती" के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है. इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को उनके मायके से "त्योहारी" (वस्त्र, मिठाई, फल, आदि;) भेजी जाती है. "दक्ष" द्वारा यज्ञ के समय अपने दामाद "शिव" का भाग न निकालने का प्रायश्चित्त भी इसमें स्पष्ट दिखाई पड़ता है. बेटी दामाद को उपहार देना बहुत पुन्य माना जाता है.

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2. पतित पावनी गंगा को धरती पर लाने का, भागीरथ का प्रयास भी, मकर संक्रांति के दिन ही पूरा हुआ था. हिमालय से निकलकर, भागीरथ के पीछे पीछे चलते हुए, "गंगा" मकर संक्रांति के दिन ही सागर से मिली थी. मकर संक्रांति के अवसर पर, बंगाल के क्षेत्र में स्थित, "गंगा सागर" के स्नान का बहुत महत्त्व है. कहा जाता है - "सारे तीरथ बार बार , गंगा सागर एक बार" । सागर मे मिलने से पहले गंगा जी सहस्त्रो धाराओ मे विभाजित हो जाती जहां पर गंगा जी समुद्र मे मिलती वहा पर चारो ओर भागीरथी के पूर्वजो महाराजा सगर एवं उनके पुत्रो की अस्थियां चारो ओर फ़ैली हुई थी जिन्हे अपने आप मे समेटने के लिए गंगा अनेको धाराओ मे विभक्त हो गई थी

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3.महाभारत काल में दक्षिणायन मे मृत्यु के बजाये सर सय्या मे छ : माह असीम कष्ट भोगते हुए बिता कर "पितामह भीष्म" ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रान्ति के दिन का ही चयन किया था. उनको इच्छा म्रत्यु का वरदान था, उनकी इच्छा के बिना उनकी म्रत्यु नहीं हो सकती थी. महाभारत के युद्ध की सामाप्ति के बाद, हस्तिनापुर को युधिष्ठिर के हाथों में सुरक्षित देखकर, भगवान् भास्कर के "उत्तरायण" में आने के बाद देह को त्याग दिया था . उतरायण मे मृत्यु को शुभ माना जाता है एवं ईस दिन मृत्यु होने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।

मकर संक्राति मे दान-पुन्य का बिशेष महत्त्व माना जाता है. मकर संक्राति के अवसर पर बेटी दामाद को सम्मान उपहार देना और गरीबों को दान देना, भीष्म पितामह की ईच्छा मृत्यु एवं भागीरथी की भगीरथ प्रयास तथा दक्ष प्रजापति के द्वारा किये गए अपने बेटी दामाद के अपमान के प्रायश्चित के रूप में देखा जाता है.इस पर्व को पूरे हर्षोल्लाष के साथ मनाये और दान- धर्म का कार्य करते हुए जीवन को सफल बनाए.

बी एस बघेल

 


SWASTIK

Posted by bsbaghel on December 11, 2014 at 11:35 AM Comments comments (0)

+ स्वस्तिक +

स्वस्तिक हिन्दु धर्म मे प्रतिक चिन्ह के रुप मे प्रथम स्थान रखता है । किसी भी प्रकार के समरोह या धर्मिक आयोजन पूजन कार्यक्रम हो स्वस्तिक का चिन्ह सर्व प्रथम बनाया एवं पूजन किया जाता है ।

स्...वस्तिक शब्द का अर्थ हुआ ' शुभ ' ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला।

स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं।

स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’( + ) कहते हैं। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। जर्मनी के हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था।

स्वस्तिक का महत्व............

स्वस्तिक को चित्र के रूप में भी बनाया जाता है और लिखा भी जाता है जैसे "स्वास्ति न इन्द्र:" आदि.

स्वस्तिक भारतीयों में चाहे वे वैदिक हो या सनातनी हो या जैनी ,ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ... शूद्र सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवाह आदि संस्कार घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर "ऊँ" औरस्वस्तिक का दोनो का अथवा एक एक का प्रयोग किया जाता है। हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वस्तिक का अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है,बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बुआ के द्वारा बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है,स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर

हमेशा प्रभावी रहे,स्वस्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे,चारों तरफ़ भटके नही,वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फ़ैलाव सम्बन्धित दिशा से सम्पूर्ण इनर्जी को एकत्रित करने के बाद बिन्दु की तरफ़ इकट्ठा करने से भी माना जाता है,स्वास्तिक

का केन्द्र जहाँ चारों भुजायें एक साथ काटती है,उसे सिर के बिलकुल बीच में चुना जाता है,बीच का स्थान बच्चे के सिर में परखने के लिये जहाँ हड्डी विहीन हिस्सा होता है और एक तरह से ब्रह्मरंध के रूप में उम्र की प्राथमिक अवस्था में उपस्थित होता है और वयस्क होने पर वह हड्डी से ढक जाता है,के स्थान पर बनाया जाता है। स्वस्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है,पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरण कौमुदी में ५४ वें क्रम पर अव्यय पदों में गिनाया गया है। यह स्वास्तिक पद ’सु’ उपसर्ग तथा

’अस्ति’ अव्यय (क्रम ६१) के संयोग से बना है,इसलिये ’सु+अस्ति=स्वास्ति’ इसमें ’इकोयणचि’सूत्र से उकार के स्थान में वकार हुआ है। ’स्वास्ति’ में भी ’अस्ति’ को अव्यय माना गया है और ’स्वास्ति’ अव्यय पद का अर्थ ’कल्याण’ ’मंगल’ ’शुभ’ आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब स्वास्ति में ’क’ प्रत्यय का समावेश हो जाता है तो वह कारक का रूप धारण कर लेता है और उसे ’स्वस्तिक ’ का नाम दे दिया जाता है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व में अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है,जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है,अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वस्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है,हिटलर का यह फ़ौज का निशान था,कहा जाता है कि वह इसे अपनी वर्दी पर दोनो तरफ़ बैज के रूप में प्रयोग करता था,लेकिन उसके अंत के समय भूल से बर्दी के बेज में उसे टेलर ने उल्टा लगा दिया था,जितना शुभ अर्थ सीधे स्वास्तिक का लगाया जाता है,उससे भी अधिक उल्टे स्वस्तिक का अनर्थ भी माना जाता है। स्वास्तिक की भुजाओं का प्रयोग अन्दर की तरफ़ गोलाई में लाने पर वह सौम्य माना जाता है,बाहर की तरफ़ नुकीले हथियार के रूप में करने पर वह रक्षक के रूप में माना जाता है।

काला स्वस्तिक शमशानी शक्तियों को बस में करने के लिये किया जाता है,लाल स्वास्तिक का प्रयोग शरीर

की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा के प्रति भी माना जाता है,वैद्य़ एवं चिकित्सा जगत , मे भी स्वस्तिक का प्रयोग आदि काल से किया है,लेकिन वहां सौम्यता और दिशा निर्देश नही होता है। केवल धन (+) का निशान ही मिलता है। पीले रंग का स्वस्तिक धर्म के मामलों में और धार्मिक संस्कार के मामलों में किया जाता है,विभिन्न रंगों का प्रयोग विभिन्न कारणों के लिये किया जाता

स्वस्तिक के चारो और सर्वाधिक सकारात्मक ऊर्जा (पॉजीटिव एनर्जी )पाई गई है दूसरे स्थान पर शिवलिँग है इसे वोविस नाम के वैज्ञानिक ने अपनी तकनीक से नापा इसलिये इसे वोविस इनर्जी कहते है । अधिक सकारात्मक उर्जा (पॉजीटिव एनर्जी )की बजह से स्वास्तिक किसी भी तरह का वास्तुदोष तुरंत समाप्त कर देता है।

MAHARANA PRATAP SPECIAL FEATURE

Posted by bsbaghel on March 24, 2014 at 7:15 AM Comments comments (0)

महाराणा प्रताप के संबंध मे कुछ रोचक जानकारीयां

 

* महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो... और लम्बाई - 7'5'' थी

*महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था

 कवच, भाला,ढाल,और हाथ मे दो मियां वाली तलवार का वजन मिलाने पर 207 किलो होता था

*महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि उदयपुर राजघराने के संग्रालय में सुरक्षित है

*अकबर ने घोषणा  किया था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो

आधा हिंदुस्तान के वे वारिस होंगे ,केवल बादशाहत  अकबर की रहेगी

*हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ की ओर से 20000 सैनिक लडे थे और अकबर कि ओर से 85000 सैनिक युध्ध में शामील हुए

* महाराणा प्रताप सोने चांदी और महलो को छोड़कर  20 साल तक मेवाड़ के जंगलो में घूमते रहे थे।

महाराणा ने जब महल का त्याग किया तब उनके साथ लोहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ दिया

और उनके साथ रहकर दिन रात महाराणा कि फ़ौज के लिए तलवारे बनायीं ।

इसी समाज को  गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है सादर नमन है ऐसे समाज को

*हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी जमीन में तलवारे पायी गयी।

* आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 मे हल्दी घाटी  में मिला था .

* महाराणा प्रताप को अस्त्र शस्त्र कि शिक्षा जयमल मेड़तिया ने दी थी ।

* महाराणा प्रताप ने  8000 राजपूतो को लेकर 60000 मुगलो से लडा था.

* युद्ध में 48000 सैनिक मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे .

*महाराणा प्रताप के देहांत पर अकबर भी रो पडे थे .

*मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर कि फ़ौज को अपने तीरो से रौंद डाला था

वे राणाप्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे

आज भी मेवाड़ के राज चिन्ह मे एक ओर राजपूत है तो दूसरी ओर भील

*राणा का घोडा चेतक महाराणा को 26 फीट के नाला को एक छलांग मे पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ।

* चेतक एक टांग टूटने के बाद भी नदी को पार कर गया। जहा चेतक घायल हुआ वहॉ  खोड़ी इमली नाम का पेड़ है

* जहा महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक मरा वहां हल्दी घाटी में चेतक का मंदिर है।

* राणा का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी

* चेतक और हेतक नाम के दो घोड़े थे

* मरने से पहले महाराणा ने खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था

* मेवाड़ राजघराने के वारिस को एक लिंग जी भगवान का दीवान माना जाता है।

* अकबर को अफगान के शेख रहमुर खान ने कहा था अगर तुम राणा प्रताप और जयमल मेड़तिया को अपने साथ मिला लोगे,   तो तुम्हे विश्व विजेता बनने से कोई नहीं रोक सकता पर इन दोनों वीरो ने जीते जी कभी हार नहीं मानी।

* महाराणा प्रताप एक ही झटके में दुश्मन सैनिक एवं सैनिक के घोडा को काट डालते थे

* जब अब्राहम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी

माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लाना है ।

तब उनकी माँ का जवाब मिला "

उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुठ्ठी मिट्टी लेकर आना जहां का राजा अपने प्रजा के

प्रति इतना वफ़ादार था  जिसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना "

बद किस्मती से उनका वह दौरा रदद्ध हो गया था।

"बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ' ( Book of President USA)

*छत्रपति शिवाजी भी मूल रूप से मेवाड़ से तालूक रखते थे वीर शिवा जी के पर दादा उदयपुर महाराणा के छोटे भाई थे

 

 


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